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मिश्र बानी: वाद्य स्वातंत्र्य का सूत्र

कला का अस्तित्व मानवीय संवेदनाओं और सृजनेन्द्रिक क्षमताओं के संयोग के परिणामस्वरूप उद्भूत होता है। नैसर्गिक अनुभूति को तराश कर जब मानव उन स्पंदित संवेदनाओं को किसी भौतिक भित्ती पर रचता है तब कला का जन्म होता है। यदि कलाकार के अन्दर स्वयं रसानुभूति नहीं है तो उसके द्वारा प्रदर्शित कला भी निर्जीव ही होगी।

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डा मिश्र     पैंसिलवनिया,1971

सुप्रसिद्ध विचित्र वीणा वादक के रूप में प्रतिष्ठित, डॉ लालमणि मिश्र एक अद्भुत संगीत-सृजनकर्ता थे। सहजता और पूर्णता उनके संगीत का अंग था। उनकी सांगीतिक कार्यक्षमता उनके शास्त्रीय ज्ञान का दर्पण थी साथ ही उन्हें अपने द्वारा बजाए गये प्रत्येक वाद्य की पकड़ और विशिष्टताओं को समझने की अद्भुत क्षमता थी। डॉ. मिश्र एक ध्रुवपद गाायक थे। उन्होंने न केवल उसकी जटिलता को सीखा बल्कि अपनी किशोर अवस्था में ही, उसके विस्तार, आलाप, उपज और विभिन्न प्रकार की लयकारियों को आत्मसात कर इस गायन कला की आत्मा को सिद्ध कर लिया। Continue reading

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