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वैचारिक संकीर्णता: भँवर-बिद्धता का संकट

भारतीय शास्‍त्रीय संगीत को हम तब तक नहीं समझ सकते जब तक हम उसे एक विषय या मनोरंजन का एक साधन समझते रहेंगे। यह बात सच है कि वस्‍तु की उपलब्‍धता उस वस्‍तु की महत्‍ता को कम कर देती है पर अयोग्‍य हाथों में पहुँचने पर तो उस वस्‍तु का नाश ही हो जाता है। भारतीय शास्‍त्रीय संगीत एक प्रकार का संगीत नहीं बल्कि एक दर्शन है, एक चिंतन है, एक सोच है, परमानंद को प्राप्‍त करने का एक साधन है, परमेश्‍वर के दर्शन का एक स्रोत है।

भारतीय संगीत की शास्‍त्रीयता स्‍वरों में क्लिष्‍टता पैदा नहीं करती वरन् स्‍वरों को धूमकेतु के समान प्रकाशित कर, उन्‍हें एकसार कर, उन स्‍वर बिंदुओं में प्राण फूँक देती है जिसके फलस्‍वरूप स्‍वर मानवीय गुणों को प्राप्‍त कर सम्‍पूर्णता को प्राप्‍त होते है। Continue reading

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