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‘एकरूपता की वैयक्तिकता’

भारत में शास्त्रीय संगीत के उच्‍चस्तरीय प्रशिक्षण के लिये उपयुक्‍त केन्‍द्रों की कमी आज भी अनुभवDSCN0217 की जाती है। यह कोई नया अभाव नहीं है। बुद्धि के साथ, प्रतिभा होने पर ही संगीत सीखा जा सकता है। हाँ, संगीत-शास्त्र का एक भाग केवल बुद्धि-परक माना जा सकता है। किंतु केवल इस बुद्धि-परक अंश को ही भारतीय संगीत शिक्षण नहीं माना जा सकता। आज इस वैश्विक सन्निकटता युग में हमारा शिक्षण-दर्शन भी परिवर्तन चाहता है। समय की गति प्रभावित करने वाली इक्कीसवीं शताब्दी में इच्छा और भोग की दूरी घट गयी है। सोच और अनुसँधान में समय गँवाने के अपेक्षा त्वरित अनुकरण श्रेयस्कर प्रतीत होता है। इसलिये उद्योग, बाज़ार, प्रशासन, मीडिया आदि की तर्ज़ पर भारतीय शिक्षण में भी बदलाव लाये जाने चाहिये—ऐसा मानना उचित प्रतीत होने लगा। Continue reading

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