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राग काल

राग काल निर्धारण के अध्ययन में अध्वदर्शक स्वर परमेलप्रवेशक राग की समझ आवश्यक है।

अध्वदर्शक स्वर

airclip3प्रात:कालीन संधिप्रकाश रागों में शुद्ध मध्यम की प्रबलता के साथ कोमल ‘रे ध’ का प्रयोग बहुलता से होता है। इस समय के कुछ रागों में तीव्र मध्यम का प्रयोग भी होता है। किन्तु शुद्ध मध्यम की अपेक्षा, वह दुर्बल रहता है। ललित, परज, रामकली इसके उदाहरण हैं। उसके बाद दूसरे प्रहर के और तीसरे प्रहर के रागों में ‘रे ध’ कोमल वाले राग और फिर ‘रे ध’ शुद्ध वाले रागों का गायन वादन होता है। Continue reading

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भारतीय वीणाओं में श्रेष्ठ ‘विचित्रवीणा’

VicVinaभारतीय वाद्यों के विकास की परंपरा अति प्राचीन रही है। यद्यपि इनका विकास क्रम वैदिक परंपरा से चला आ रहा है तथापि समय के साथ इनके रूप  में परिवर्तन भी होता रहा है। मुख्‍य रूप से इनका परिवर्तन अपने स्‍वरूप, बनावट और  वादन सामग्री में दिखाई देता है। इन वाद्यों का विकास निरंतर होता गया और ये प्राचीन वाद्य समाज के बदलाव व विकास के  साथ अपने परिष्‍कृत व परिमार्जित रूप लेकर समाजिक उन्‍नयन के समानान्‍तर चलते हुए हमारे सामने आते गये। आज भारतीय  वाद्यों के जो भी प्रकार (प्रचलित या अप्रचलित) प्रचार में  हैं वे सभी हमारी भारतीय परंपरा और उसके सुन्‍दर इतिहास के साक्षी हैं। Continue reading

संगीत का महात्‍म्‍य:एक चिंतन

ccastयाज्ञवल्‍क्‍य स्‍मृति में लिखा है:-

” वीणा वादन तत्‍वज्ञ: श्रुति जाति विशारद: ।

तालज्ञश्‍चाप्रयासेन मोक्ष मार्गम् च गच्‍छति।।”

अर्थात् जो वीणा वादन के तत्‍व को जान लेता है और जो श्रुति जाति तथा ताल में विशारद हो चुका है वह बिना प्रयास के ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्‍त करता है।

उपरोक्‍त कथन भले ही आज से हज़ारों वर्ष पहले लिखा गया हो पर आज भी इस बात को अनुभव करने वाले इस कथन की सत्‍यता पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाना कदापि पसंद नहीं करते हैं। Continue reading