Tag Archives: Post modern Society

‘एकरूपता की वैयक्तिकता’

भारत में शास्त्रीय संगीत के उच्‍चस्तरीय प्रशिक्षण के लिये उपयुक्‍त केन्‍द्रों की कमी आज भी अनुभवDSCN0217 की जाती है। यह कोई नया अभाव नहीं है। बुद्धि के साथ, प्रतिभा होने पर ही संगीत सीखा जा सकता है। हाँ, संगीत-शास्त्र का एक भाग केवल बुद्धि-परक माना जा सकता है। किंतु केवल इस बुद्धि-परक अंश को ही भारतीय संगीत शिक्षण नहीं माना जा सकता। आज इस वैश्विक सन्निकटता युग में हमारा शिक्षण-दर्शन भी परिवर्तन चाहता है। समय की गति प्रभावित करने वाली इक्कीसवीं शताब्दी में इच्छा और भोग की दूरी घट गयी है। सोच और अनुसँधान में समय गँवाने के अपेक्षा त्वरित अनुकरण श्रेयस्कर प्रतीत होता है। इसलिये उद्योग, बाज़ार, प्रशासन, मीडिया आदि की तर्ज़ पर भारतीय शिक्षण में भी बदलाव लाये जाने चाहिये—ऐसा मानना उचित प्रतीत होने लगा। Continue reading

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भारतीय संगीत और भारतीय संस्कार

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तरकश के तीर

भारतीय अज्ञानता का क्‍या कहना कि संगीत की भारतीय परम्‍परा को आज भी संदेह से ही देखा जा रहा है। हमारे आधुनिक समय के अधिकॉंश भारतीय वाद्यों को विदेशी वाद्यों का विकसित रूप बताकर हमारे ही कलाकार बड़े गर्व से अपने संगीत का बखान करते हैं। चाहे वह सितार हो या तबला, चाहें वह तानपुरा हो या सरोद या शहनाई। सभी कुछ तो अरब और यूनान से आया है। इस मामले में बिचारे उ. अमीर खुसरो बिना बात बलि का बकरा बने हुए हैं। उन्‍होंने तो अपने बखान में (निश्‍चय ही वो कम बड़बोले नहीं थे) कहीं भी यह घोषित नहीं किया है कि उन्‍होंने उपर्युक्‍त कोई भी वाद्य का निर्माण किया। पर उनके चाहने वालों ने इसका श्रेय भी उन्‍हें ही दे डाला। Continue reading

स्‍वरसंवाद-और-मानवीय-गुण

भारतीय संगीत वास्‍तव में मानवीय गुण और चरित्र का निष्पाप दर्पण है। जब बात होती है स्‍वर संवाद की, श्रुतियों की, स्‍वरों के लगाव की तो प्रकृति के स्‍वाभाविक स्‍वरूप में सृजन और सौंदर्य के निर्माण का शुद्धतम स्‍वरूप प्रस्‍फुटित हो उठता है। ये बात जग जाहिर सी है कि आज भारत के अंदर आम व्‍यक्ति अपनी शुद्धता खो बैठा है। दूर किसी और देश में बैठे सद्चरित्र, तेजवान और श्रमसाध्‍य मनुष्‍यों को आज अपना ही देश बेगाना लगने लगा है।

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वातायन के पार

इस बात का अहसास मात्र सांगीतिक अवचेतना के बढ़ते दायरे से ही लगाया जा सकता है कि भारतीय मानसिकता पर बेसुरे स्‍वर कितने हावी हो चुके हैं। आज अधिकांश स्‍वरों की दुनिया में गूँजते स्‍वर अपना अस्तित्‍व ही खो चुके हैं। स्‍वरों के अंदर जिस संवाद तत्‍व को भारतीय आत्‍मा -परमात्‍मा का योग मानते आये है वो संवाद तत्‍व शुद्धता के बिना प्राप्‍त नहीं किया जा सकता है। Continue reading