Tag Archives: Dr. Lalmani Misra

मिश्र बानी: वाद्य स्वातंत्र्य का सूत्र

कला का अस्तित्व मानवीय संवेदनाओं और सृजनेन्द्रिक क्षमताओं के संयोग के परिणामस्वरूप उद्भूत होता है। नैसर्गिक अनुभूति को तराश कर जब मानव उन स्पंदित संवेदनाओं को किसी भौतिक भित्ती पर रचता है तब कला का जन्म होता है। यदि कलाकार के अन्दर स्वयं रसानुभूति नहीं है तो उसके द्वारा प्रदर्शित कला भी निर्जीव ही होगी।

????????????????????????????????????

डा मिश्र     पैंसिलवनिया,1971

सुप्रसिद्ध विचित्र वीणा वादक के रूप में प्रतिष्ठित, डॉ लालमणि मिश्र एक अद्भुत संगीत-सृजनकर्ता थे। सहजता और पूर्णता उनके संगीत का अंग था। उनकी सांगीतिक कार्यक्षमता उनके शास्त्रीय ज्ञान का दर्पण थी साथ ही उन्हें अपने द्वारा बजाए गये प्रत्येक वाद्य की पकड़ और विशिष्टताओं को समझने की अद्भुत क्षमता थी। डॉ. मिश्र एक ध्रुवपद गाायक थे। उन्होंने न केवल उसकी जटिलता को सीखा बल्कि अपनी किशोर अवस्था में ही, उसके विस्तार, आलाप, उपज और विभिन्न प्रकार की लयकारियों को आत्मसात कर इस गायन कला की आत्मा को सिद्ध कर लिया। Continue reading

Advertisements

सितार: एक ऐतिहासिक सत्य – भाग – १ (तथ्य- डॉ लाल मणि मिश्र)

Sitar1भारत में वैदिक युग से आज तक समय समय पर भाषाओं में आमूल परिवर्तन होते रहे हैं। भाषा परिवर्तन के कारण भी विभिन्न प्राचीन वस्तुओं के नये नाम रख लिये जाते हैं। अस्तु, यदि वर्तमान किसी वस्तु के ऐतिहासिक विकास क्रम को समझना है तो सतर्कतापूर्वक उपरोक्त दोनो सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए छानबीन करनी होगी।

उन्नीसवीं शताब्दी तक संगीतज्ञ का प्रदर्शन क्षेत्र या तो राज दरबार था अथवा मंदिर था। नाद विद्या के श्रेष्ठ विद्वानों का जनसाधारण से निकट का संबंध नगण्य सा था। Continue reading

सितार: एक ऐतिहासिक सत्य- भाग-२

caves1त्रितंत्री वीणा ही जंत्र के नाम से प्रचलित थी इसका बहुत बड़ा प्रमाण संगीत रत्नाकर की कल्लिनाथ टीका है। वे कहते हैं-
“तत्र त्रितन्त्रिकैव लोके जन्त्र शब्दनोच्यते”
                                    (संगीत रत्नाकर,कल्लिनाथ की टीका,वाद्याध्याय- पृष्ठ-२४८)

दूसरा प्रमाण है अबुल फज़ल की ‘अाइने-अकबरी’ जिसमें उन्होंने जन्त्र नामक वाद्य यंत्र का वर्णन करते हुए उसमें कटा तुम्बा लगने, १६ पर्दे होने और पॉच तार लगने की सूचना दी है। Continue reading

भारतीय वीणाओं में श्रेष्ठ ‘विचित्रवीणा’

VicVinaभारतीय वाद्यों के विकास की परंपरा अति प्राचीन रही है। यद्यपि इनका विकास क्रम वैदिक परंपरा से चला आ रहा है तथापि समय के साथ इनके रूप  में परिवर्तन भी होता रहा है। मुख्‍य रूप से इनका परिवर्तन अपने स्‍वरूप, बनावट और  वादन सामग्री में दिखाई देता है। इन वाद्यों का विकास निरंतर होता गया और ये प्राचीन वाद्य समाज के बदलाव व विकास के  साथ अपने परिष्‍कृत व परिमार्जित रूप लेकर समाजिक उन्‍नयन के समानान्‍तर चलते हुए हमारे सामने आते गये। आज भारतीय  वाद्यों के जो भी प्रकार (प्रचलित या अप्रचलित) प्रचार में  हैं वे सभी हमारी भारतीय परंपरा और उसके सुन्‍दर इतिहास के साक्षी हैं। Continue reading