संगीत संस्थानों की शिक्षण पद्धति में बदलाव आवश्यक क्यों?

सन् १९०१ में जब पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर द्वारा संगीत का प्रथम संस्थान लाहौर में स्थापित हुआ तब से लेकर आज तक संगीत संस्थानों के विकास की एक लम्बी यात्रा हुई है। संस्थाओं द्वारा संगीत शिक्षण को प्रारंभ करने वाले संगीतवेत्ताओं ने संस्थाओं के महत्व को समझा और भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा जिसके कारण संगीत संबंधी बिखरी सामग्री का संकलन कर उनके तथ्यों को पुनर्मूल्यांकित कर अनेक भ्रांतियों का निराकरण किया गया। पहली बार संगीत का इतिहास लिखा गया। सैकडों पुस्तकों और ग्रंथों का निर्माण हुआ। प्राचीन शास्त्रों का अनुशीलन, विश्लेषण और शोध हुआ जिसके फ़लस्वरूप कई नये तथ्यों की जानकारी हासिल हुई। आम व्यक्ति के अंदर भी इस कला के प्रति रुझान पैदा हुआ। कई विश्वविद्यालयों, निजी संस्थाओं और स्कूल-कॉलेजों में संगीत के प्रशिक्षण की व्यवस्था हुई। Continue reading

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प्रकृति व संगीत

आश्‍चर्य की बात नहीं कि मानव जाति के विकास के आदिम काल में भी संगीत का अस्तित्‍व पाया  जाता है। पुरातत्‍ववेत्‍ताओं ने खोहों में पत्‍थर के औजारों और लुप्‍त जाति के पशुओं की हड्डियों के साथ रेनडियर (प्राचीन जाति के हिरण)की हड्डी से और सींग से बनी हुई बॉंसुरी पायी है। यह बहुत ही पुरानी प्रस्‍तर युग की बात है। ले ओनाडुड़ उुले ने जमीन के नीचे से एक 11 तारों का बाजा निकाला है जो प्राय: 5 हजा़र साल पुराना है। इससे स्‍पष्‍ट है कि इतने प्राचीन काल में भी मनुष्‍य भिन्‍न भिन्‍न स्‍वरों के संक्रमण को जानता था और उससे आनन्‍द उठाता था। Continue reading

भारतीय वीणाओं में श्रेष्ठ ‘विचित्रवीणा’

VicVinaभारतीय वाद्यों के विकास की परंपरा अति प्राचीन रही है। यद्यपि इनका विकास क्रम वैदिक परंपरा से चला आ रहा है तथापि समय के साथ इनके रूप  में परिवर्तन भी होता रहा है। मुख्‍य रूप से इनका परिवर्तन अपने स्‍वरूप, बनावट और  वादन सामग्री में दिखाई देता है। इन वाद्यों का विकास निरंतर होता गया और ये प्राचीन वाद्य समाज के बदलाव व विकास के  साथ अपने परिष्‍कृत व परिमार्जित रूप लेकर समाजिक उन्‍नयन के समानान्‍तर चलते हुए हमारे सामने आते गये। आज भारतीय  वाद्यों के जो भी प्रकार (प्रचलित या अप्रचलित) प्रचार में  हैं वे सभी हमारी भारतीय परंपरा और उसके सुन्‍दर इतिहास के साक्षी हैं। Continue reading

कृपा वर्षा

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर रचित गीताँजलि के एक पद का मुक्त अनुवाद श्रीमती कृष्णा शुक्ला द्वारा

तब आओ मुझ पर कृपा वर्षा से।
जब आकर्षण लोप हो गया हो जीवन
तब स्फूर्त गीत से मुझ पर छा जाओ।

अंधोत्तेजित चर्या- कोलाहल जब
चँहु ओर फैल ढँक ले मुझे दूर
मेरे निकट आओ अखण्ड स्थिर मौन के स्‍वामी,
स्निग्ध शान्ति से भर जाओ।

बन्द एक कोने में जब
सकुचाया हताश मेरा याचक हृदय
अनुनय में
झुका बैठा हो,

तोड़, खोल दो दरवाज़े को
मेरे राजन! और आओ
विजयी नरेश के गौरव गुण गाते परिजन अनुचर संग।

अंधा कर दे मन को जब
तीव्र कामना माया रज से –
ओ पवित्र जाग्रत आओ तुम
अपने प्रकाश और वज्र युक्त उस क्षण।

‘एकरूपता की वैयक्तिकता’

भारत में शास्त्रीय संगीत के उच्‍चस्तरीय प्रशिक्षण के लिये उपयुक्‍त केन्‍द्रों की कमी आज भी अनुभवDSCN0217 की जाती है। यह कोई नया अभाव नहीं है। बुद्धि के साथ, प्रतिभा होने पर ही संगीत सीखा जा सकता है। हाँ, संगीत-शास्त्र का एक भाग केवल बुद्धि-परक माना जा सकता है। किंतु केवल इस बुद्धि-परक अंश को ही भारतीय संगीत शिक्षण नहीं माना जा सकता। आज इस वैश्विक सन्निकटता युग में हमारा शिक्षण-दर्शन भी परिवर्तन चाहता है। समय की गति प्रभावित करने वाली इक्कीसवीं शताब्दी में इच्छा और भोग की दूरी घट गयी है। सोच और अनुसँधान में समय गँवाने के अपेक्षा त्वरित अनुकरण श्रेयस्कर प्रतीत होता है। इसलिये उद्योग, बाज़ार, प्रशासन, मीडिया आदि की तर्ज़ पर भारतीय शिक्षण में भी बदलाव लाये जाने चाहिये—ऐसा मानना उचित प्रतीत होने लगा। Continue reading

भारतीय संगीत और भारतीय संस्कार

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तरकश के तीर

भारतीय अज्ञानता का क्‍या कहना कि संगीत की भारतीय परम्‍परा को आज भी संदेह से ही देखा जा रहा है। हमारे आधुनिक समय के अधिकॉंश भारतीय वाद्यों को विदेशी वाद्यों का विकसित रूप बताकर हमारे ही कलाकार बड़े गर्व से अपने संगीत का बखान करते हैं। चाहे वह सितार हो या तबला, चाहें वह तानपुरा हो या सरोद या शहनाई। सभी कुछ तो अरब और यूनान से आया है। इस मामले में बिचारे उ. अमीर खुसरो बिना बात बलि का बकरा बने हुए हैं। उन्‍होंने तो अपने बखान में (निश्‍चय ही वो कम बड़बोले नहीं थे) कहीं भी यह घोषित नहीं किया है कि उन्‍होंने उपर्युक्‍त कोई भी वाद्य का निर्माण किया। पर उनके चाहने वालों ने इसका श्रेय भी उन्‍हें ही दे डाला। Continue reading

वैचारिक संकीर्णता: भँवर-बिद्धता का संकट

भारतीय शास्‍त्रीय संगीत को हम तब तक नहीं समझ सकते जब तक हम उसे एक विषय या मनोरंजन का एक साधन समझते रहेंगे। यह बात सच है कि वस्‍तु की उपलब्‍धता उस वस्‍तु की महत्‍ता को कम कर देती है पर अयोग्‍य हाथों में पहुँचने पर तो उस वस्‍तु का नाश ही हो जाता है। भारतीय शास्‍त्रीय संगीत एक प्रकार का संगीत नहीं बल्कि एक दर्शन है, एक चिंतन है, एक सोच है, परमानंद को प्राप्‍त करने का एक साधन है, परमेश्‍वर के दर्शन का एक स्रोत है।

भारतीय संगीत की शास्‍त्रीयता स्‍वरों में क्लिष्‍टता पैदा नहीं करती वरन् स्‍वरों को धूमकेतु के समान प्रकाशित कर, उन्‍हें एकसार कर, उन स्‍वर बिंदुओं में प्राण फूँक देती है जिसके फलस्‍वरूप स्‍वर मानवीय गुणों को प्राप्‍त कर सम्‍पूर्णता को प्राप्‍त होते है। Continue reading