कला का कारक: भाव

IMG_0575भारतीय संगीत के बृहद इतिहास के विहंगम अवलोकन पश्चात, उसे आत्मसात कर उसका सार्थक विश्लेषण करने तथा उसके प्रमाणों का सही प्रस्तुतिकरण कर पाने की क्षमता, कितने लोगों में है,  यह  एक महत्वपूर्ण प्रश्न हो सकता है। किसी भी विषय के अंतरस्थ मूल्यों को समझने के लिये, एक विशेष अनुभवसिक्त दृष्टि सिद्ध होने के उपरांत ही उस विषय के आन्तरिक प्रवाह को भली प्रकार विश्लेषित किया जाता है। भारतीय कला, दर्शन और साहित्य में निहित अपरिमित वैचारिक तथ्यों का अध्ययन एवं अनुशीलन अपने आप में एक गंभीर अभ्यासीय प्रक्रिया है जिसमें बाह्य प्रकृति जन्य किसी भी प्रकार के उल्कापातों का कोई स्थान नहीं है।

मानव विकास की प्रक्रिया में साहित्य, संगीत और कलाओं का सर्वाधिक योगदान एवं महत्व रहा है। इतिहास के पन्नों में भी जिस मानव सभ्यता को सबसे अधिक विकसित और ज्ञानवान समझा गया वह समाज अपने प्रत्येक दैनांगिनी में साहित्य, संगीत कला एवं दर्शन का उच्चस्तरीय ज्ञान प्रतिष्ठित किये हुए था। विश्व भर से भारत आने वाले पर्यटकों ने इनका स्पष्ट उल्लेख जगह जगह अपने संस्मरणों में किया है। चाहें वह सम्राट समुद्रगुप्त का काल हो या राजा हर्षवर्धन अथवा फिर चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य या बादशाह अकबर का; सभी के शासन काल में साहित्य, संगीत व कलाओं का अद्वितीय सृजन, सर्जन और संरक्षण हुआ। प्राचीन भारतीय ज्ञान का भण्डार वैदिक वांगमय, उपनिषदों, शिक्षाग्रंथों, प्रातिशाख्य, पुराणों, तत्कालीन बौद्ध व जैन साहित्य, विभिन्न साहित्यिक मिमांसाओं एवं टीकाओं में प्राप्त है। ज्ञान का यह भण्डार भारत के हज़ारों साल के इतिहास का साक्षी है। इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं कि आज हम जिन मानवीय संवेदनाओं को विस्मित भाव से देखते हैं उसकी प्रखर चर्चा इन ग्रंथों में पहले ही बड़े विस्तार से हो चुकी है।

मानवीय संवेदनाओं को रस सिक्त कर उसके अन्दर निहित स्थायी भावों को संचारित व उद्दीप्त कर मानव मन को आनंद सहोदर करना ही कलाओं का परम् लक्ष्य है। चौथी शताब्दी में महर्षि भरत द्वारा सर्वप्रथम नाट्य के संदर्भ में रस निष्पत्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ जिसकी व्याख्या दो हज़ार साल तक अनेक विद्वानों, शास्त्रकारों और समालोचकों द्वारा की जाती रही है। चाहें शंकुक का ‘अनुमितिवाद’ हो या भट्टलोलट्ट का ‘आरोपवाद’, चाहें भट्टनायक का ‘भुक्तिवाद’ हो या फिर  अभिनवगुप्त का ‘अभिव्यक्तिवाद’,  सभी ने कला के माध्यम से सामाजिकों पर पड़ने वाले प्रभावों की ही व्याख्या की है। भारतीय दर्शन में कला संबंधी इतनी समग्रता के साथ व्याख्या शायद ही कहीं हुई हो। महर्षि भरत ने रस की व्याख्या करते हुए एक सूत्र दिया है-

“विभावानुभावव्यभिचारि:संयोगात्द्रसनिष्पत्ति:”

विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

 ‘अत्राह -यथा हि नानाव्यंजनौषधिद्रव्य संयोगाद्रस निष्पत्ति: तथा नानाभावोपगमाद्रस निष्पत्ति:।’  

 जिस प्रकार विविध व्यञ्जनों के निर्माण में द्रव्य तथा मसाले आदि के संयोग से रस उत्पन्न होता है उसी प्रकार अनेक भावों के संयोग से रस की भी निष्पत्ति होती है।

  इस सूत्र की व्याख्या में ही समस्त मानवीय संवेदनाओ का निचोड़ है। रस की निर्मिति से ही कलाओं का अस्तित्व है। ऐसी कोई भी कृति जिसमें रस नहीं हो निर्जीव है और वह कला की श्रेणी में नहीं आती है। कला का मूल मन्त्र यही है। इसका लक्ष्य ऐसे वातावरण का निर्माण करना है जिसके प्रभाव से समस्त ब्रम्हाण्ड ‘आनन्द सहोदर’ हो उठे।

आज संसार में कलाओ का क्षेत्र इतना विस्तृत हो चुका है कि कला नये पंख लगा, नई उँचाइयों को छू, नये पैमाने निर्धारित कर, उनके नित नये स्वरूप निर्मित करती जा रही है।

पर यहाँ चर्चा कला के भारतीय दृष्टिकोण को समझने और उनमें निहित एक भारतीय विशिष्ठ शैली की है जो अन्य सभी देशों की कलाओं से न केवल अलग है बल्कि अपनी मजबूत पहचान के लिये भी जानी जाती है।

भरत मुनि कृत ‘नाट्यशास्त्र’ सम्भवत: विश्व में पहला ग्रंथ है जिसमें कला से संबंधित चर्चा विस्तार से की गयी है। भारत में कलाओं का श्रेष्ठ माध्यम नाट्य अथवा नाटक को माना गया है।

“न तज्ञ्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला।

नासौ योगो न तत्कर्मं नाट्येSस्मिन यन्न दृश्यते।।”

न कोई ज्ञान ऐसा है, न कोई शिल्प ऐसा है, न कोई विद्या अथवा कला ऐसी है, न कोई योग अथवा कर्म ऐसा है, जो नाट्य में दिखाई न देता हो।’

कलाओं का आस्वादन करने के लिये भी संस्कार जनित ज्ञान की आवश्यकता होती है। प्रकृति की अनन्त गहराइयों में छिपी सौंदर्य संपदा को कोई दिव्य चक्क्षु धारक ही दर्शन कर उससे जनित आनन्द से सराबोर हो सकता है। वास्तव में प्रकृति ही मानव सभ्यता के विकास में कलात्मक सुरुचि पैदा करने वाली पहली गुरू है। मानव ने सर्वप्रथम प्रकृति से ही सृजन करना सीखा। चाहें वो रंगों का इन्द्रधनुष हो या नाद गूँज। उसने विभिन्न माध्यमों का सहारा लेकर प्रकृति जन्य उपादानों में अपरिमित भाव भंगिमाओ द्वारा कला निर्माण से उद्भूत भावों को एक अद्भुत गति में डाल कर, उससे जनित आनन्द का रसास्वादन करना सीखा। आनन्द भी ऐसा जो आत्मा को परमात्मा में लीन करवा दे।

इस संबंध में आचार्य ब्रहस्पति ने ‘आचार्य पार्श्वनाथ कृत संगीत समयसार’ में उल्लेख करते हुए आनन्द के परिणाम और गान्धर्व द्वारा भी उसकी प्राप्ति में ‘तैत्तिरीयोपनिषद’ द्वितीयवल्ली, अष्टम अनुवाक्’ का संदर्भ दिया है जिसके अनुसार –

“ सदाचारी, सत्स्वभाव, सत्कुलोत्पन्न, वेदज्ञ, ब्रम्हचारियों को शिक्षा देने में कुशल, निरोग, युवा, समर्थ तथा धनसम्पत्तियुक्त पृथ्वी के सम्राट को प्राप्त होने वाला आनन्द ‘मानुष आनन्द’ है। मानुष आनन्द की अपेक्षा सौ गुना आनन्द मनुष्यगंधर्वों (मर्त्यगंधर्वों) को, उसकी अपेक्षा सौ गुना आनन्द देवगंधर्वों (दिव्य गंधर्वों) को, उसकी अपेक्षा सौ गुना आनन्द दिव्यपितरों को, उसकी अपेक्षा सौ गुना आनन्द आनानजदेवों (सृष्टि के आरम्भ में ही उत्पन्न देवों) को, उसकी अपेक्षा सौ गुना आनन्द कर्म देवों को, उसकी अपेक्षा सौ गुना आनन्द देवों को, उसकी अपेक्षा सौ गुना आनन्द इन्द्र को, उसकी अपेक्षा सौ गुना आनन्द बृहस्पति को, उसकी अपेक्षा सौ गुना आनन्द प्रजापति को और उसकी अपेक्षा सौ गुना आनन्द ब्रह्मा को प्राप्त होता है। वही आनन्द ‘श्रोत्रिय’ (सामवेदज्ञ) को प्राप्त होता है, जो कामनाहीन है।

उपनिषदों में ब्रह्म को एक ‘मौलिक आनंद की सत्ता’ कहा है। अर्थात जहां सुख दुख, का कोई द्वंद नहीं, हर्ष – विषाद, राग – द्वेष का कोई द्वंद नहीं, एक ऐसा आनंद जो विश्वव्यापी है, वही आनंद जब क्षण भर के लिये चित्त में समाता है, उसमें विश्रांति पाता है; ऐसी अवस्था को ही ‘ब्रह्मानंद सहोदर’ कहा गया है। अर्थात जब हमारी चेतनाए कालगत और व्यक्तिगत सभी सीमाओं से ऊपर उठ ऐसी अवस्था को प्राप्त होती हैं जहाँ सिर्फ आनंद का ही साम्राज्य है तब हम भी उसी आनंद का क्षणिक अनुभव करते हैं जो ब्रह्म की सत्ता है। वास्तव में ब्रह्मानंद सहोदर का अर्थ है ब्रह्मानंद के समीप आ जाना क्योंकि ब्रह्मानंद प्रकृति द्वारा प्रदत्त आनंद नहीं वरन वह सच्चिदानंद का स्वयं का स्वभाव ही है। ठाकुर जयदेव सिंह के शब्दों  में ‘ब्रह्मानंद में जो होता है वहाँ अप्राकृत ‘शब्द’ होता है चित्त में  प्राकृत ‘शब्द’ होता है। चित्त में  जो  शब्द है वह प्रकृति की देन है और ब्रह्मानंद में जो शब्द है वह प्रकृति की देन नहीं वरन् सच्चिदनंद का स्वयं स्वभाव है।‘ चूंकि ब्रह्मानंद नित्य है और रस जनित आनंद अनित्य, अस्तु, यह कला के आश्रित होने के  फलस्वरूप कला के सानिध्य से ही जीवंत होता है और रस की अनुभूति प्राप्त होती है,   कला के सम्पर्क से बाहर आते ही फिर से साधारण अवस्था में पहुँच जाता है।

कला और उससे जनित आनन्द का सीधा संबंध ‘भाव’ से है। भरत मुनि ने अपनी रस संबंधी व्याख्या में इस बात को स्पष्ट किया है कि कला (यहाँ नाट्यकला का ही संदर्भ लिया जायेगा) के माध्यम  से ही भाव पैदा होते हैं और रस की उत्पत्ति होती है। भावों और अभिनय से सम्बद्ध स्थायी भावों का विद्वान लोग, मानसिक आस्वादन कर लेते हैं। ये आस्वादन कला के सौष्ठव से अभिभूत मन की चरम् अवस्था का भी द्योतक है। जिस भाव के आत्मिक समायोजन से मन को आनन्दातिरेक की पराकाष्ठा का आभास होता है उसे आत्मसात करने का अभ्यास भी ज्ञान के वैभव का ही परिणाम है। भारतीय दर्शन में कलाओं द्वारा मानवीय संवेदनाओं और उनके भावों को सम्प्रेषित कर रस में  परिवर्तित कर आनंद से परिपूर्ण सामाजिकों के प्रत्येक अनुभवों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

भरत ने अपने नाट्यशास्त्र के सातवें अध्याय के प्रथम श्लोक में ‘भाव क्या है’ इस पर प्रकाश डाला है।

‘किं भवंतीति भावा: किं वा भावयंतीति भावा:।

उच्यते वागंग्सत्वोपेतांकाव्यार्थाभावयंतीति भावा इति॥

 अर्थात भाव क्या होते हैं? वे होते हैं,  इसी लिये भाव कहलाते हैं अर्थात भावना प्रकट करने के कारण इन्हें भाव कहा जाता है। – वाणी, अंग और मन के माध्यम से जो काव्य के अर्थों को व्यंजित करते हैं, नाट्य की सामान्य भाषा में  वे भाव कहलाते हैं। संस्कृत में भावयति इति भाव: भी है और भवति भाव: भी प्रयोग हुआ है। दोनों में अंतर यही है कि एक ‘भवति’ भाव वह है जो हमारे बीच बीत रहा है उसका अनुभव और दूसरा ‘भावयति भाव:’ वह है जो दैनिक जीवन के धरातल से उठ कर कला के माध्यम से उन्ही भावों को अभिव्यक्त कर उसका अनुभव कराना। भरत के अनुसार कला के माध्यम से जब इन भावों का प्रदर्शन होता है तो वह एक ऐसे धरातल पर आसीन हो जाता है जहॉ से वह आस्वादमय हो रस निष्पत्ति का कारक हो  जाता है।

कला और जीवन में भावों का यही अंतर है। नाट्य में जो अर्थ विभावों द्वारा आकृष्ट हो और अनुभावों द्वारा अवगत कराया जाये तथा नाट्य में वाणी, अंग और सात्विक अभिनय द्वारा व्यक्त किया जाये उसे भाव कहते हैं।

जैसा पूर्व में उल्लेखित हुआ है भरत द्वारा बताए गये रस निष्पत्ति के लिये भावों को भावित करने हेतु विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारी को प्रमुख तत्व माना है। दूसरे शब्दों में रस वह है जो स्थायी भावों को विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों के द्वारा सह्रदय के मन में अभिव्यक्त करता है। वास्तव में हम जिसे रस कहते हैं वह एक आनन्दात्मक अनुभव है जो स्थायी भावों की एक विलक्षण अनुभूति है।  विभाव के दो उपभेद आलंबन एवं उद्दीपन हैं – जो मुख्यरूप से कथा के प्रमुख पात्र और उनके चारों ओर व्याप्त विभिन्न प्रकार के वातावरण निर्माण में योग करने वाले अवयव हैं। अनुभाव तथा व्याभिचारी इत्यादि जीव मात्र के भावों की अनन्त कलात्मक अभिव्यक्ति का भंडार है जिसके माध्यम से कला के अनंत रूप निर्मित कर रस का निष्पादन होता है।

कला अभिव्यक्ति के माध्यम से जिन भावों का अनुभव होता है वह वास्तव में समय, देश और काल से परे जाकर ‘सार्वभौमिक’ अवस्था को प्राप्त हो जाता है। वास्तव में जब भाव सार्वभौमिक होता है रस की निष्पतति भी तभी हो सकती है। इस संदर्भ में अनेक विद्वानों में मतभेद रहा है कि किन तत्वों के संयोग से  रस की निष्पत्ति होती है। यहॉ संयोग और निष्पत्ति दो शब्द हैं जिनकी बहुत विस्तृत व्याख्या विद्वानों द्वारा की गयी है। इनमें से मम्मट के रसोत्पत्ति मत का भट्टलोलट्ट ने प्रतिपादन किया है। अलंकारवादी आचार्य दण्डी ने भी भट्टलोलट्ट व मम्मट का समर्थन किया है। दण्डी का रस सूत्र भी भरत समान है – ‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पति:’ अर्थात् , विभाव आलम्बन इत्यादि का जो संयोग है उससे रस  की चित्तवृत्ति रूप इत्यादि स्थायी भावों की निष्पत्ति उत्पन्न हुआ करती है।  अभिनव गुप्त द्वारा ‘अभिव्यक्तिवाद’ को प्रचारित किया गया और आज भी उन्हीं के मत को स्वीकारा जा रहा है। इनके मत को ‘आलंकारिक मत’ भी कहते हैं।

इनके अनुसार ‘साधारणीकरण’ जो है वह भावना का व्यापार नहीं है अपितु  व्यंजना का अलौकिक – ‘विभावन व्यापार’ है। यहाँ पर कला के माध्यम से  रसिक को मिलने वाले रसानंद  संबंध की महती चर्चा हुई है।

भरत द्वारा रस संबंधी चर्चा मुख्यरूप से नाट्य के संबंध में ही हुयी है। नाट्य में दृश्य व श्रव्य दोनों माध्यमों के प्रयोग द्वारा अभिव्यक्ति एवं व्यञ्जनशक्ति का प्रभाव बहुत होता है। किन्तु गान वादन की स्वतंत्र प्रस्तुति में ऐसा कर पाना प्राय: संभव नहीं होता। आज गीत वाद्य नाट्य से स्वतंत्र होकर भी अपनी श्रेष्ठता का परिचय दे रहा है। श्रोता के भावों को भावित कर रस मय स्थिति में लाना तो कला का गुण ही है  किन्तु  यहाँ यह क्रिया अत्यंत सूक्ष्म एवं तरल होती है। इस प्रकार के कला माध्यमों की अपनी एक अलग संप्रेषण प्रणाली मानी जा सकती है। जहाँ भाव रसिक के चित्त में स्थित संस्कार जन्य स्थायी भावों को उद्दीप्त कर श्रोता को आनन्द की चरम गति तक पहुँचा देता है। नाट्य के प्रारंभ होने के पूर्व जो गीत वाद्य प्रयुक्त होते हैं (उन्हें नाट्य में ‘पूर्वरंग’के अन्तर्गत रखा है),  वे किसी प्रसंग का हिस्सा नहीं होते। अभिनवगुप्त के अनुसार वे ‘स्वरप्रतिष्ठित’ होते हैं। उन्हें किसी रस के अनुसार नहीं चलना होता है। भरत ने ‘पूर्वरंग’ में किसी रस का नाम नहीं लिया। अर्थात जहाँ संगीत किसी कथा नाट्य का हिस्सा नहीं बल्कि स्वतंत्र गान – वादन का कार्य करता है वहाँ गान वाद्य स्वत: रञ्जक हो जाते हैं।

अधुना जिस प्रकार का गीत वाद्य प्रचार में है वह भी स्वत: रंजक होने के फ़लस्वरूप पूर्वरंग के अन्तर्गत प्रयुक्त गीत – वाद्य प्रयोग सरीखा ही है। विद्वानों ने इस संबंध में विस्तृत चर्चा की है। उनके अनुसार – ‘ सम्पूर्ण भाव जगत में दो मुख्य भेद माने गये हैं।

१- द्रुति – जिसमें चित्त द्रवित होता है,

२- दीप्ति- जिसमें ह्रदय में उत्तेजना का अनुभव होता है।

इन दोनों को शास्त्र में क्रमश: ‘माधुर्य’ एवं ‘ओजस’ कहा गया है। मम्मट के अनुसार ये दोनो ही ‘गुण तत्व’ रस के धर्म हैं। अर्थात् विभिन्न रसों की अनुभूति में ये गुण चित्त की अवस्था को प्रदर्शित करते हैं। भरत ने भी पूर्वरंग के प्रसंग में किसी भी रस का नाम नहीं लिया है बल्कि उनके दो भेद बताये हैं – १- सुकुमार २- उद्धत।

उपरोक्त दोनो को माधुर्य तथा ओजस माना जा सकता है। डॉ प्रेमलता शर्मा के अनुसार- ‘नाट्य से स्वतंत्र आज के गीत वाद्य प्रयोग को यदि सुकुमार और उद्धत अथवा माधुर्य और ओजस् इन दो वर्गों में बाँट दें तो नाट्य के प्रसंग में हुए रसगत विचार को नाट्य से स्वतंत्र संगीत में सीधे जोड़ देने से जो समस्यायें उठती हैं उनका निराकरण हो सकता है।’

वास्तव में संगीतात्मक अभिव्यक्ति का आधार मात्र ध्वनि ही होती है। काव्य का रचनात्मक भाषा जन्य व्यापार सांगीतिक गतिविधियों का आधार नहीं होता वहाँ तो मात्र नाद ही है जो विभिन्न ध्वनि माध्यमों से उतार चढ़ाव आन्दोलन कम्पन इत्यादि के सहारे भिन्न भिन्न भावों का निष्पादन करता है। विद्वानों ने चित्त पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए भावों को दो भावों में विभाजित किया है –

१- उल्लास २- अवसाद

उल्लास के अन्तर्गत प्रेम, सौंदर्य, वात्सल्य, वीर इत्यादि भाव एवं अवसाद के अन्तर्गत शोक, करुण, रौद्र, भयानक, विभत्स इत्यादि आते हैं। चूँकि नाद की भाषा किसी घटना या कथा पर आधारित नहीं होती यह ध्वनियों के वैशिष्ठ से परिपूर्ण भावों से सुसज्जित आभिव्यक्ति का आधार बनती हैं अस्तु संगीत में नौ रस की अपेक्षा चार रसों को ही मानना उचित समझा गया। ये चार रस है- शान्त, शृंगार, करुण एवं वीर। (ये एक अलग ही विषय है कि इन रसों का संगीत में किस प्रकार प्रयोग किया जाता है।) भरत ने भी जातियों का रस निर्धारित किया है। पं भातखण्डे जी ने भी स्वरो के आधार पर रागों का रस निर्धारित किया है। ये सच है कि एक कलाकार की असीमित  काल्पनिक सृजनशीलता नाद के अनगिनत द्वार खोलती है और फिर संगीत कला अपने आप में इतनी सूक्ष्म और व्यापक है कि स्वर विशेष के आधार पर रस के शास्त्र को प्रमाणित करना लगभग असंभव है। डॉ सुरेश व्रत रॉय के शब्दों में – ‘नादात्मक अभिव्यक्ति की असीम संभावना कलाकार की कल्पना से सीमित स्वरों के सैकड़ों रंग बिखेरते हैं जिनकी व्याख्या, परिभाषा, सीमाँकन कठिन है।’

वर्तमान समय में इस बात की आवश्यकता है कि सौंदर्यशास्त्र संबंधी विभिन्न मान्यताओ पर बृहद चर्चा की जाये और भारतीय दृष्टिकोण को विश्व स्तर पर समझाया जाये। क्योंकि भारतीय दर्शन को समझने और आत्मसात करने के लिये इसे समझना आवश्यक है। भारतीय शास्त्रकारों ने तो इसमें अनेक वैचारिक तथ्यों के साथ किसी भी तर्क पर खुली चर्चा की है एवं किसी प्रकार के भ्रम को स्थान नहीं दिया गया है। मनुष्य के द्वारा प्रयुक्त अथवा उपभोग की गयी सामग्री का कला के निर्माण और उसके अध्ययन में जो शास्त्रगत विवरण प्राप्त होता है वह न केवल अद्वितीय है बल्कि तथ्यपूर्ण और सार गर्भित भी है। आज आवश्यक है कि रसात्मक अभिव्यक्ति की संभावनाओं और उनके मानव मात्र पर होने वाले शाश्वत प्रभाव पर विद्वानों, शास्त्रकारों, कलाकारों के बीच पुन: चर्चा हो  जिससे इस अत्यंत जटिल पर हार्दिक विषय का एक निश्चित मार्ग प्रशस्त हो सके।

[पुस्तक ‘संगीत प्रवाह चिरंतन‘ (सं. संतोष पाठक, नवजीवन पब्निकेशन, जयपुर, 2017,  ISBN 978-81-8268-192-7)  से साभार]

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