जाति लक्षण (Characteristics of Jati)

भारत में शास्त्रीय संगीत की परंपरा बड़ी प्राचीन है। राग के प्रादुर्भाव के पूर्व जाति गान की परंपरा थी जो वैदिक परंपरा का ही भेद था। जाति गान के बारे में मतंग मुनि कहते हैं –

“श्रुतिग्रहस्वरादिसमूहाज्जायन्त इति जातय:”

अर्थात् – श्रुति और ग्रह- स्वरादि के समूह से जो जन्म पाती है उन्हें ‘जाति’ कहा है।

जिस प्रकार आधुनिक समय में राग और उसके दस लक्षण माने जाते हैं वैसे ही जाति गान के निर्माण में दस लक्षणों का होना आवश्यक समझा जाता था। वास्तव में मूलरूप से प्राचीन जाति लक्षण ही थे जिसके आधार पर ही आधुनिक  राग लक्षण का निर्माण किया गया।  भरत के नाट्यशास्त्र में ‘जाति’ का ही विशेष वर्णन मिलता है। किसी स्वर समूह से किस प्रकार ‘जाति’ का ढाँचा कैसे बनता है इस पर विचार कर भरत ने ‘जाति’ के दस लक्षण बताये हैं। इन लक्षणों को पाँच जोड़ों के रूप में देखा जा सकता है।

१- २ –    ग्रह-अंश

३-४-      तार-मंद्र

५-६-      न्यास-अपन्यास

७-८-     अल्पत्व-बहुत्व

९-१०-   षाडव- औडुव

जाति लक्षण का प्रयोजन है कि उसमें (जाति में) किस स्वर की प्रमुखता होगी, वह कहाँ से प्रारंभ होगा, कहाँ गीत की समाप्ति होगी, तार और मन्द्र का कैसा प्रयोग होगा, कौन सा स्वर दुर्बल और कौन सा साधारण होगा, एक या दो स्वरों का वर्जन कर किस प्रकार से षाडव व औडव रूप बनेंगे। जब ये सभी बातें किसी स्वर समूह में निश्चित नियम द्वारा समाहित होंगी तो वह जाति अथवा राग के अन्तर्गत माना जायेगा। इन्हीं नियमों को दस पारिभाषिक नाम देकर ‘जाति लक्षण’ कहा गया है।

१-२ ग्रह – अंश – ग्रह का अर्थ है ऐसी जगह जहॉ से बंदिश को उठाया जाता है। आज कल भी ‘उठान’ शब्द का इस्तमाल होता मिलता है। यह संस्कृत का शब्द है।

अंश का अर्थ किसी चीज़ का हिस्सा होता है। जाति के संदर्भ में इसका अर्थ हुआ ऐसा स्वर जो भाग बनाये। यानि जिसके माध्यम से मंद्र, मध्य और तार को विभाजित किया जा सके। प्राचीन काल में जाति व्यवस्था थी जिसका आधार ग्राम और मूर्छना रहा है। प्रत्येक ग्राम की सात सात मूर्छनायें होती हैं। मूर्छना का प्रारंभ जिस स्वर से होता था उसे ‘अंश’ के रूप में जाना गया। मूर्छना का अर्थ ही है सात स्वरों का आरोहण अवरोहण। अर्थात् जिस स्वर से मूर्छना प्रारंभ होने जा रही है वह उस मूर्छना का अंश स्वर होगा। सातों स्वरों को अंश स्वर बना कर हरेक ग्राम में सात मूर्छनायें बनाई जा सकती हैं। दूसरे शब्दों में ग्राम के मूल अन्तरालों को बिना बदले हुए मात्र अंश स्वर के आधार पर नया सप्तक बन जाता है।

इस प्रकार अंश बदलने से स्वरों के अंतराल बदल जाते हैं। इस प्रकार प्राचीनों को सप्तक में क्या स्वर लगेगा इसकी जानकारी न दे मात्र अंश स्वर बतला देने से काम चल जाता था।

३-४ तार मन्द्र – जाति गान में अंश स्वर तो मध्य सप्तक से ही प्रारंभ होता था और तार स्थान अंश स्वर से चार, पाँच या सात स्वर तक भी तार सप्तक में प्रयोग कियाजा सकता था। उसी प्रकार अंश से आठवें स्वर के नीचे तक मन्द्र का प्रयोग होता था। जाति या राग में कुछ तो पूर्वांग प्रधान कुछ उत्तरांग प्रधान व कुछ सभी सप्तक में विचरण करने वाले होते हैं। अर्थात् जातियों और रागों को वास्तव में मंद्र तार और मध्य के बीच में ही घूमना होता है। इसीलिये तार – मन्द्र को जाति या राग के लक्षणों में स्थान दिया गया है।

५-६- न्यास – अपन्यास- जहाँ पूरे गीत की समाप्ति हो वह न्यास और जहाँ गीत के किसी खण्ड की समाप्ति हो तो वह अपन्यास कहलाता है। हम जानते ही हैं कि किसी गीत या गीत खण्ड की समाप्ति किसी भी स्वर में रुकने से नहीं हो जाती है। उसके लिये निर्धारित स्वर स्थान होना आवश्यक है।

७-८- अल्पत्व – बहुत्व- जाति या राग में जो स्वर दुर्बल प्रयुक्त होता है उसे अल्पत्व और जो स्वर प्रबल होता है उसे बहुत्व के नाम से जाना जाता है। इन दोनों के ही दो दो भेद हैं।

१- लंघन अल्पत्व,  २- अनभ्यास अल्पत्व

जब किसी जाति या राग में कोई स्वर प्रयुक्त तो होता है पर उसको लाँघ जाते हैं, जैसे राग बिहाग में ऋषभ स्वर को आरोह करते समय लाँघते रहते हैं — यथा,  ऩी स ग म ग — तब उसे लंघन अल्पत्व कहेंगे। इसी प्रकार से जब किसी स्वर को बिना उस पर ठहराव किये प्रयोग करते हैं तो उसे अनभ्यास अल्पत्व कहेंगे। यथा- राग पूरिया में ऋषभ स्वर।

१- अनालंघन बहुत्व  २- अभ्यास बहुत्व – ये दोनो ही अल्पत्व के उल्टे हैं; अर्थात् जिस स्वर का लंघन नही किया जा सकता वह अनालंघन बहुत्व, और जाति या राग में जिस स्वर का बार बार प्रयोग होता है वह स्वर अभ्यास बहुत्व कहलाता है।

९-१०- षाडव-डव- सप्तक में एक या दो स्वरों का वर्जन करके षाडव या औडव जाति या राग बनते हैं। पं० ओंकार नाथ ठाकुर के अनुसार ‘नवीनता या वैचित्र उपजाने में राग पद्धति में वर्जन का विशेष महत्व है। किन्तु मनमाने ढंग से वर्जन नहीं किया जा सकता। जो स्वर जाति का पूर्ण रूप में दुर्बल या अल्प होगा उसी का लोप या वर्जन हो सकेगा।’ भारतीय संगीत में आज भी सम्पूर्ण षाडव औडव राग हैं जैसे – सम्पूर्ण राग – यमन, काफी, जयजयवन्ती, पूरियाधनाश्री। षाडव राग- मारवा, पूरिया, रागेश्री, बागेश्री। औडव राग- सारंग, मालकौंस, भूपाली इत्यादि।

जाति लक्षण के इस विश्लेषण से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय परंपरा में सांगीतिक मर्मज्ञता, अन्तर्विश्लेषणात्मकता, सूक्ष्म दृष्टि और गहन चिन्तन का बहुत गहरा सन्तुलन था जो विश्व में भारतीय दर्शन की एक मिसाल है।

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