भारतीय वीणाओं में श्रेष्ठ ‘विचित्रवीणा’

VicVinaभारतीय वाद्यों के विकास की परंपरा अति प्राचीन रही है। यद्यपि इनका विकास क्रम वैदिक परंपरा से चला आ रहा है तथापि समय के साथ इनके रूप  में परिवर्तन भी होता रहा है। मुख्‍य रूप से इनका परिवर्तन अपने स्‍वरूप, बनावट और  वादन सामग्री में दिखाई देता है। इन वाद्यों का विकास निरंतर होता गया और ये प्राचीन वाद्य समाज के बदलाव व विकास के  साथ अपने परिष्‍कृत व परिमार्जित रूप लेकर समाजिक उन्‍नयन के समानान्‍तर चलते हुए हमारे सामने आते गये। आज भारतीय  वाद्यों के जो भी प्रकार (प्रचलित या अप्रचलित) प्रचार में  हैं वे सभी हमारी भारतीय परंपरा और उसके सुन्‍दर इतिहास के साक्षी हैं।

अधुना प्रचलित व अप्रचलित शास्‍त्रीय वाद्यों में सितार, सरोद, सारंगी, सुरबहार, रुद्रवीणा, विचित्रवीणा, जलतरंग, शंतूर, बॉंसुरी, शहनाई, तम्‍बूरा, तबला, पखावज, दुक्‍कड़, कर्नाटकीय वीणा, बट्टाबीन, मृदंगम् इत्‍यादि वाद्य हैं। इन्‍हीं वाद्यों में एक वाद्य है –  ‘विचित्रवीणा‘ जिसके महात्‍म्‍य और विराटता की चर्चा यहॉं की जा रही है। आज जिसे हम ‘विचित्रवीणा’ कह कर पुकारते हैं उसे प्राचीनकाल में ब्राम्‍ही वीणा, घोषवती,घोषिका या एकतंत्री वीणा कहा जाता था। समय के साथ इस प्राचीन वाद्य का प्रचार घटता गया और मध्‍य काल में तो यह करीब करीब लुप्‍त प्राय: हो गयी। सम्‍भवत: इसका प्रमुख कारण वाद्यों में सारिका का प्रयोग (9वीं शताब्‍दी में सर्वप्रथम किन्‍नरी वीणा में सारिका का प्रयोग किया गया) प्रारंभ होना तथा षडज और मध्‍यम ग्राम के साथ ही मूर्छना पद्धति का  तिरोहित होना (11वीं-12वीं शती) और षडज स्‍वर का स्थिर हो जाना है जिसके फलस्‍वरूप चिकारी इत्‍यादि की व्‍यवस्‍था का आविष्‍कार हुआ और किन्‍नरी, त्रितंत्री और चित्रा वीणा के नये रूप सामने आाये। मध्‍य काल में किन्‍नरी ने ही रुद्र वीणा का रूप लिया। त्रितंत्री वीणा का विकास दो रूपों में हुआ,  एक तो निबद्ध तंबूरा के रूप में और दूसरा अनिबद्ध तम्‍बूरा के रूप में। निबद्ध तंबूरा ही आगे चलकर सितार के रूप में विकसित हुआ और अनिबद्ध तंबूरा तानपुरे के रूप में प्रचलित हुआ। चित्रावीणा का स्‍वरूप विकसित हो कर सरोद और रबाब के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। ये सभी वाद्य किसी एक व्‍यक्ति के आविष्‍कार का परिणाम नहीं हैं बल्कि इन वाद्यों के निर्माण और विकास में युगों की सृजनशीलता और कलात्‍मकता का योगदान रहा है जो आज भी अपने आप में एक आश्‍चर्य का विषय है। विचित्रवीणा का विकास मध्‍यकाल में बाधित ही रहा किन्‍तु  इस अतुलनीय वाद्य का पुन: प्रचार लगभग 18वीं 19वीं शताब्‍दी में फिर हुआ जो अपने मौलिक रूप से न केवल भिन्‍न दिखाई दी वरन् सभी वाद्यों से बड़ी और क्लिष्‍ट भी बनी।

विचित्रवीणा का स्‍वरूप बहुत कुछ रुद्रवीणा के समान है। किन्‍तु बारीकी से देखने पर यह उससे काफी भिन्‍न है। प्रमुख बात ये है  कि इसमें परदों का प्रयोग नही किया जाता है जिसके कारण इसका वादन क्लिष्‍टतम हो जाता है। लगभग 50 इंच लम्‍बा, 5इंच चौड़ा एवं ढाई इंच गहरी डाड इस वीणा के बृहद स्‍वरूप को दिखाती है। तुन्‍न या टीक से बने दण्‍ड में बॉंयीं और दाहिनी ओर छ: बड़ी खूँटियॉं होती है जिससे मुख्‍य तार बँधे होते हैं।इसके अतिरिक्‍त चार से पॉंच खूँटियॉं चिकारी की लगती हैं। दाहिनी ओर  दो  और बॉंयीं ओर तीन  खूँटियॉं मुख्‍य दण्‍ड में  लगायी जाती हैं। इस प्रकार10 से 11 बड़ी खूँटियॉं इस वाद्य में प्रयुक्‍त होती हैं।इसके अलावा 11 से 15 तक तरब की खूँटिया भी  होती हैं जिनसे तरब  के तार बॉंधे जाते हैं। इस बृहद वीणा को दो बड़े तुम्‍बों के सहारे सीधा रखा जाता है। जिसकी उँचाई जमीन से करीब 15 इंच पर होती है। इस वाद्य के अग्र भाग में मोर अथवा किसी पक्षी का मुखड़ा एक लकड़ी में नक्‍काशी कर के अलग से लगा दिया जाता है। पिछले भाग का हिस्‍सा लगभग 12 इंच का टुकड़ा होता है मुख्‍य तार की खूँटियॉं इसी टुकड़े के दोनो ओर लगती हैं। इस वाद्य को कॉंच के बने बट्टे से बजाया जाता है।

इस वाद्य का वादन मुख्‍य रूप से दो तारों में किया जाता है। पहला तार जो 8 नम्‍बर का इस्‍पात का तार होता है इसे षडज स्‍वर में मिलाया जाता है। इस तार में मध्‍य सप्‍तक से तार सप्‍तक तक का विस्‍तार होता है। इसके बाद दूसरा तार 9 नम्‍बर के इस्‍पात का होता है जिसे मंद्र स्‍वर के पंचम में मिलाते हैं। इसके बाद के दो तार पीतल के 20 नम्‍बर व 18 नम्‍बर के होते हैं जो क्रमश: मंद्र षडज और अति मंद्र पंचम में मिलाये जाते हैं। इसके अतिरिक्‍त दो तार 7-7 नम्‍बर के बाज के तार के पहले और अति मंद्र पंचम के बाद लगाये जाते हैं जिन्‍हें ‘छेड़ के तार’ कहा जाता है। चिकारी के तार आगे भी होते हैं और पीछे भी।

वादन करने के लिये करीब 23 इंच का स्‍थान घुड़च और तार गहन के बीच का होता है। इस पूरे हिस्‍से में कॉच का बट्टा बॉयें हाथ से रगड़ते हुए स्‍वरों को ध्‍वनित किया जाता है। दा‍हिने हाथ में तर्जनी और मध्‍यमा उँगली में मिजराब धारण कर तारों को छेड़ा जाता है। वादक को दाहिने और बॉंये हाथ का सामंजस्‍य बनाये रखने के लिये अभ्‍यास करना पड़ता है जो एक अत्‍यंत कठिन प्रक्रिया है।

इस वाद्य की वादन विधि अत्‍यंत कठिन व श्रमसाध्‍य होने के कारण इसका वादन बहुत कम कलाकार कर पाते हैं। बीसवीं सदी में ‍जिन प्रमुख वीणावादकों का नाम लिया जाता है उनमें उस्‍ताद अब्‍दुल अज़ीज़ खॉं,  संगीतेंदु डॉ. लाल मणि मिश्र, श्री गोपाल कृष्‍ण, श्री रमेश प्रेम, डॉ. गोपालशंकर इत्‍यादि हैं। 21 वीं सदी में कुछ महिलाओं ने भी इस वाद्य को अपनाने में पहल की है जो एक शुभ लक्षण है।

विचित्र वीणा सम्‍भवत: भारतीय वाद्यों में श्रेष्‍ठ इसलिये भी कहलाती है क्‍योंकि जब तक रागदारी, स्‍वरों का समुचित ज्ञान, संवाद तत्‍व और लय- ताल पर अधिकार प्राप्‍त नहीं हो जाता इस वाद्य को बजा पाना सम्‍भव नहीं है। जो कलाकार इन तत्‍वों का ज्ञान प्राप्‍त किये बिना ही बजाने की चेष्‍टा करते हैं वे या तो खुद हास्‍य का पात्र बन जाते हैं या कुछ समय के बाद इसे दु:साध्‍य कहकर छोड़ देते हैं। इस वाद्य में ओजस्विता पैदा कर सकने का गुण मुश्किल से ही आ पाता है। यद्यपि उपर्युक्‍त बात सभी भारतीय वाद्यों में लागू होती है तथापि अन्‍य तंत्री वाद्यों में सामान्‍यत: स्‍वरों का स्‍थान सारिका अथवा पर्दों के द्वारा निर्धारित कर दिया जाता है जिसके फलस्‍वरूप वे इतने दुर्बोध नहीं लगते। ये तर्क दिया जा सकता है कि   जिन तंत्री वाद्यों में पर्दा व्‍यवस्‍था नहीं होती जैसे सरोद सारंगी इत्‍यादि वहॉं भी स्‍वरों के स्‍थान का अंदाज़ अवश्‍य लगाना पड़ता है किन्‍तु, इन वाद्यों की लम्‍बाई चौड़ाई आमतौर पर उतनी बृहद नहीं होती जितनी विचित्र वीणा की है, अस्‍तु, चाहें तान क्रिया हो या मुर्की, गमक इत्‍यादि स्‍वरों को स्‍पर्श करने की प्रक्रिया, उनके बजाने के लिये वाद्य वादन का दायरा उतना ही बड़ा बनाना पड़ता है जितना बड़ा उस वाद्य को बजाने का क्षेत्र होता है।

वीणावादन में जो सामग्री बजायी जाती है वह गत और गायकी दोनों के मेल से ही बनती है इसके साथ ही यह  हर कलाकार की अपनी समझ और क्षमता पर निर्भर करती है। डॉ. लाल मणि मिश्र जी ने इस वाद्य में तकनीकी और प्रायोगिक विस्‍तार की अनन्‍त संभावनाओं को जन्‍म दिया जिसके फलस्‍वरूप इसके वादन के  क्षेत्र का आश्‍चर्यजनक विस्‍तार सम्‍भव हो पाया। उन्‍होंने इस वाद्य को जिस प्रकार साधा था उसको देख कर यह कहा जा सकता है कि ऐसा वादन कहीं भी देखा सुना नहीं गया। उनकी वादन शैली में कोई भी राग अपनी सृजनशीलता के उच्‍चतम स्‍तर पर पहुँच अपना विस्‍तार कर सकता था। उनके द्वारा बजाये गये रागों में सिंदूरा, कौशीकान्‍हणा, बसंतबहार तिलंग आनन्‍द भैरव,मुल्‍तानी और आनन्‍द भैरवी रागों के एल.पी., सीडी और वीडियो अमरीका से निकाले गये किन्‍तु दुर्भाग्‍य से उनका भारत में आगमन नहीं हो सका। इसके अलावा उनके द्वारा बजाये गये 90 से भी ज्‍यादा रागों का संग्रह स्‍पूल टेप में मौजूद है जो आज भी सुविज्ञ श्रोताओं तक नहीं पहुँच पाया है। जिन्‍होंने उनके वादन को सुना है वे इस संबंध में मेरी बात से पूर्ण सहमत होंगे। भारत में बड़ी बड़ी संस्‍थाओं ने भी कभी ये नहीं सोचा कि देश में आज न जाने कितने पुराने कलाकारों की रिकार्डिंग्स जगह जगह बिखरी पड़ी हैं जिनका एक सम्‍पूर्ण डेटा बना कर उन सभी रिकार्डिंग्स को जनता के सामने लाया जाये। इसके लिये जो प्रोजेक्‍ट बनाये जाते हैं वे अनुभवहीनता के कारण या तो अनुपयोगी साबित  होते हैं या बीच में ही कालकवलित हो जाते हैं।

ये दुख की बात है कि जो काम संगीत संस्‍थाओं की जिम्‍मेदारी थी वे उसे भी न निभा सके , शिक्षण संस्‍थाऍं महज परीक्षा करवाने और डिगरी बॉंटने के गढ बन गये और संगीत रिसर्च अकादमी नियमों के पेंच में अपने समूचे आदर्शों को भुला बैठी। सवाल ये उठता है कि जब ये सारी संस्‍थाऍं जो सामग्री उनके पास संग्रहित है उसे ही नहीं सम्‍भाल पा रही हैं तो जो अप्रचलित वाद्य और गायन- वादन शैलियॉं आज बिना किसी प्रश्रय के आज तक किसी प्रकार जिवित बच गयी हैं उनके संरक्षण के लिये वे क्‍या उपाय कर पायेंगे?

विचित्र वीणा न केवल प्राचीन बल्कि दुर्लभ वाद्यों में से है बल्कि आज इस वाद्य को सीखने व सिखाने वाले भी नगण्‍य हैं। जो वाद्य आज हजारों वर्षों की यात्रा करता हुआ यहॉं तक पहुँचा है क्‍या इस वाद्य और इसके समान दूसरे दुर्लभ वाद्यों के प्रति हमारी कोई जिम्‍मेदारी नहीं? अपने देश के इन दुर्लभ वाद्यों को बजाने की प्रेरणा और प्रचार कैसे हो ऐसे उपाय करे जाने चाहिये। आज प्रचार प्रसार के जमाने में जहॉं हर प्रकार की शिक्षा मार्केट में बिकती हैं  वहॉं भारतीय संगीत वाद्यों के प्रशिक्षण के प्रचार प्रसार में संकोच कैसा? आज हमारी इसी अज्ञानता और अनभिज्ञता के कारण जहॉं पावन गंगा तक के लुप्‍त हो जाने की आशंका जताई जा रही हो वहॉं उन भारतीय संस्‍कृति के न जाने कितनी अमूल्‍य धरोहरों को हम हर दिन खोते जा रहे हैं इसका अंदाज़ा कौन लगायेगा?

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2 responses to “भारतीय वीणाओं में श्रेष्ठ ‘विचित्रवीणा’

  1. Readers may find this series of lessons useful: http://www.youtube.com/watch?v=NhZSg0vmNdE
    Misrabani lessons on Vichitra Veena

  2. विचित्र विणां का सिर्फ नाम सुने थे या तसवीरों में देखे थे। आज उसके बारे जान सके, बहुत ही अच्छी तरह से आपने समझाया है।
    भारतीय संस्कृति की अमुल्य धरोहर के प्रति आपके सटीक प्रश्न का हम सर्मथन करते हैं। हमें अपनी संस्कृत विरासत के प्रति जागरुक जरूर होना चाहिये।
    धन्यवाद

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