वैचारिक संकीर्णता: भँवर-बिद्धता का संकट

भारतीय शास्‍त्रीय संगीत को हम तब तक नहीं समझ सकते जब तक हम उसे एक विषय या मनोरंजन का एक साधन समझते रहेंगे। यह बात सच है कि वस्‍तु की उपलब्‍धता उस वस्‍तु की महत्‍ता को कम कर देती है पर अयोग्‍य हाथों में पहुँचने पर तो उस वस्‍तु का नाश ही हो जाता है। भारतीय शास्‍त्रीय संगीत एक प्रकार का संगीत नहीं बल्कि एक दर्शन है, एक चिंतन है, एक सोच है, परमानंद को प्राप्‍त करने का एक साधन है, परमेश्‍वर के दर्शन का एक स्रोत है।

भारतीय संगीत की शास्‍त्रीयता स्‍वरों में क्लिष्‍टता पैदा नहीं करती वरन् स्‍वरों को धूमकेतु के समान प्रकाशित कर, उन्‍हें एकसार कर, उन स्‍वर बिंदुओं में प्राण फूँक देती है जिसके फलस्‍वरूप स्‍वर मानवीय गुणों को प्राप्‍त कर सम्‍पूर्णता को प्राप्‍त होते है। संगीत में स्थित सौंदर्य की अनुभूति मस्तिष्‍क की परिपक्‍वता पर निर्भर करती है। उसके श्रवण हेतु स्‍वरों के प्रयोग की नियमावली का जानना  आवश्‍यक नहीं होता। भारतीय संगीत के अन्‍दर स्‍वरों के लगाव को इसीलिये इतना महत्‍वपूर्ण माना है। भारतीय रागों का व्‍यक्तित्‍व इतने स्‍वाभाविक तरीके से विकसित हुआ है कि उसके अन्‍दर के माधुर्य को अपने आप प्रस्‍फुटित होने का अवसर मिल जाता है। यह संवाद तत्‍व ही भारतीय संगीत की आत्‍मा है जहॉं एक अकेला कलाकार हज़ारों लोगों की आत्‍मा के अ्रतरंग पहलुओं को भी झंकृत कर देने की क्षमता रखता है।

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पिटारी में ज्ञान

अधुना भारतीय मस्तिष्‍क प्रदूषित हो जाने के कारण नाद के अन्‍दर छिपी शक्ति और उसके सौंदर्य को समझ पाने में पूर्ण अक्षम हो चुका है। जिस प्रकार के अव्‍यवहारिक नियमों में फँसा कर भारतीय शिक्षण पद्धति का सत्‍यानाश आज किया जा रहा है वो अपने आप में भँवर-बिद्ध  बुद्धि का सबसे बड़ा उदाहरण है। भारतीय कला साहित्‍य तथा दर्शन पढ़ने के लिये जहॉं एक उम्र भी छोटी समझी जाती है वहॉं हमारे देश के नौनिहाल तीन महीने तूफानी पठन कर येनकेन प्रकारेण परीक्षा की जंग में शहीद होने को चाकचौबंद हो जाते हैं। परिणाम भी किसी हारे हुए युद्ध वीर की तरह ही होता है यानि या तो फेल या एटीकेटी। इस युद्ध के सेनापति और राजा के पास इस बात की कोई चिंता या समझ नहीं कि उनके बनाये इस युद्ध योजना में उनके कितने सिपाही (विद्यार्थी) शहीद हुए और कितने घायल।  वो बेचारे नासमझ सैनिक ऑंख मूँदकर बिना युद्ध योजना समझे खुद को बलि का बकरा बना गला कटवाने को तैयार हो जाते हैं। सवाल यह है कि क्‍या ये कल के भारत निर्माता आज अज्ञानतावश अपने आप को बलि का  बकरा बनने देते रहेंगे या इन्‍हें कभी कोई ज्ञान भी प्राप्‍त होगा?

संगीत कला और साहित्‍य की त्रिवेणी में जिसने गोता लगा लिया वह तो वैतरणी पार कर गया समझो। पर फिर वही सवाल कि कल तक नौनिहाल रहे ये युवा, आज अपने आपको दूसरे के निर्णयों पर कब तक चलाते रहेंगे? क्‍या शिक्षा का अर्थ ज्ञान प्राप्‍त करना नहीं है? ज्ञान के रास्‍ते में मनोरंजन का कोई स्‍थान नहीं है। शिक्षा को मनोरंजन के साथ जोड़ना उसके साथ‍ खिलवाड़ करने जैसा है। एक ओर तो शिक्षा के नाम पर दैत्याकार कामनाएँ — आई.आई.टी., आई.आई.एम. – पसरी हैं, दूसरी ओर ‘लर्न बाय फ़न’ जैसा शिगूफा मारी मॉन्टेसरी की सच्ची लगन का मज़ाक उड़ाता नज़र आता है। सॉफ्ट-वेयरबेस्ड डिजिटल बोर्ड पर होने वाली  पढ़ाई में शिक्षक नहीं लर्निंग-फेसिलिटेटर की ज़रूरत है।  अपने बच्चों से स्वस्थ बचपन छीन कर हम उनसे चमत्कारिक परिणाम की उम्मीद रखते हैं। आजकी पीढ़ी संतान नहीं कमाऊ पूत पालती प्रतीत होती है।

शिक्षण अत्‍यंत गंभीर प्रक्रिया है जिसके साथ बहुत बड़ी जिम्‍मेदारियॉं जुड़ी हुईं हैं। भारत में आज हर विषय को एक खिलवाड़ की तरह समझा जाता है। ऐसा मात्र इस लिये है कि नालायक को भी वही ज्ञान चाहिये जो लायक को। कितनी समदर्शी है उत्तर-आधुनिकता! शताब्दियों तक जो गुण कहलाते थे, सामंतशाही के काल में भी जिन्हें ख़त्म  न किया जा सका, उन्हें सामंतशाही करार कर आज ‘फ़्लैट वर्ल्ड’ के पटरे पर ला खड़ा किया है।   अब लायकों की संख्‍या तो बढ़ी नहीं, हॉं नालायक दर्रे दर्रे में अपनी दुकानें लगा कर बैठ गये। जैसे वो बगल में रसगुल्‍ला और रेवड़ी बिक रही है वैसे ही यहॉं ज्ञान बिक रहा है — आओ, ले लो ज्ञान बस दो ढाई लाख में। ये वाला ज्ञान  पचास हजार का… और ये वाला तो भारतीय है… ये मात्र बीस हजार का समझो। जहॉं आजकल इम्‍पोर्टेड ज्ञानी आ गये हैं और भारतीय कला साहित्‍य और संगीत को एक्‍सपोर्ट क्‍वालिटी का बनाने में जद्दोजहद कर रहे हैं, तो जैसे कॉमन वेल्‍थ में भारत का नाम बदनाम हुआ है, वैसे ही अज्ञानता से पुष्ट  एक सम्पूर्ण  पीढ़ी भविष्य में पूरे विश्व को गुरु कहे  जाने वाले देश की आधुनिक संताने मूल्य-विहीन, संस्कार-च्युत, लोलुप, अज्ञानी  के रूप में जानी जाएँगी।

चिन्ता है कि धन से भी ज्‍यादा कीमती मानव मस्तिष्‍क के क्षरण का यह देश क्‍या मूल्‍य चुकायेगा?

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4 responses to “वैचारिक संकीर्णता: भँवर-बिद्धता का संकट

  1. होता तो यह हमेशा से आ रहा है पर आज जो पुराना खोता जा रहा है और उसकी जगह नया आ रहा है वह किसी भी एक स्तर का नहीं है। कल का बुरा आज अच्छा है। कल के अच्छे को आज कोई नहीं जानता। फिर भी सब अर्थहीन क्रिया से सार्थक की उम्मीद करते हैं। आशावादिता को भी पीछे छोड़ दिया। अच्छा लिखा।

  2. Surendra Singh Bhamboo

    ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’

  3. Vartman me Bhartiya Shastriya Sangeet ki Shikshan Paddhati ki halat bahut gambhir hai aur yah bhi yatharth hota dikh raha hai ki “Hans chugega dana tinka.kauva moti khayega”.Aaj apke jaise hi prabuddh logon ke margdarshan ki avashyakta hai.

  4. स्तरहीनता की इस गिरावट को रोका जाना अनिवार्य हो गया है। ऐसे अप्रतिम विचारों को प्रकाशित करने के लिये नमन। संगीत के आस्वादन की दिशा में कार्य किया जाना अत्यंत आवश्यक है। मुझे ऐसे समस्त उद्देश्यों के लिये अपना अनुयायी समझें।

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