स्‍वरसंवाद-और-मानवीय-गुण

भारतीय संगीत वास्‍तव में मानवीय गुण और चरित्र का निष्पाप दर्पण है। जब बात होती है स्‍वर संवाद की, श्रुतियों की, स्‍वरों के लगाव की तो प्रकृति के स्‍वाभाविक स्‍वरूप में सृजन और सौंदर्य के निर्माण का शुद्धतम स्‍वरूप प्रस्‍फुटित हो उठता है। ये बात जग जाहिर सी है कि आज भारत के अंदर आम व्‍यक्ति अपनी शुद्धता खो बैठा है। दूर किसी और देश में बैठे सद्चरित्र, तेजवान और श्रमसाध्‍य मनुष्‍यों को आज अपना ही देश बेगाना लगने लगा है।

LookingWithout

वातायन के पार

इस बात का अहसास मात्र सांगीतिक अवचेतना के बढ़ते दायरे से ही लगाया जा सकता है कि भारतीय मानसिकता पर बेसुरे स्‍वर कितने हावी हो चुके हैं। आज अधिकांश स्‍वरों की दुनिया में गूँजते स्‍वर अपना अस्तित्‍व ही खो चुके हैं। स्‍वरों के अंदर जिस संवाद तत्‍व को भारतीय आत्‍मा -परमात्‍मा का योग मानते आये है वो संवाद तत्‍व शुद्धता के बिना प्राप्‍त नहीं किया जा सकता है। शुद्धता की ऐसी स्थिति, आचरण, योग, साधना और चिन्‍तन द्वारा ही प्राप्‍त होती है। प्राचीन काल से ही भारत में संगीत प्रदर्शक और संगीत साधक ये दो प्रकार के संगीतज्ञ रहे हैं। इन दोनों में अन्‍तर मात्र सांगीतिक आचरण का है। जहॉं एक संगीत को व्‍यवसाय मान कर चलता है तो दूसरा संगीत को परमात्‍मा का स्‍वरूप जान उसको आत्‍मसात कर ईश्‍वरार्पण कर देता है। इन दोनों प्रकार के साधकों का ज्ञान अपने क्षेत्र में पूर्ण रहा है। किन्‍तु पिछले दो दशकों में इन दोनों ही प्रकार के साधकों ने अपने तथाकथित संगीत के द्वारा सुधि श्रोता को निराश ही किया है। निराशा से भी ज्‍यादा ये कहना अधिक उचित है कि वे स्वयं को छला सा पाते हैं। उम्मीद कुछ कर के जाते हैंऔर सुनाई देता है कुछ और। रसज्ञ श्रोता जाते हैं सुंदर संगीत सुनने। सुरुचिपूर्ण मँच, सभागार इस आनंद कामना को उद्दीप्त करते हैं। आकर्षक वस्त्र, मुद्राओं से सज्जित कलाकार भी इस सम्भावना को दृढ़ करते हैं। किंतु जब ध्वनि के स्तर पर लचर किंतु दृश्यव्यता से परिपूर्ण, प्रस्तुति को सुनते हैं तो अपनी ही कामना पर संदेह के प्रश्न-चिह्न लगा बैठते हैं।

आज यदि आधुनिक संसाधनों के द्वारा अमूल्‍य संरक्षित संगीत का खजाना उपलब्‍ध न होता तो विश्‍व भर में फैले संगीत रसिकों का हाल बेहाल हो जाता। एक शोध पत्र में इस बात का उल्‍लेख हुआ है कि आज जीवित व्‍यक्तियों के द्वारा गाये गये संगीत से ज्‍यादा लोग उन संगीतज्ञों के रिकार्डेड संगीत को ज्‍यादा सुन रहे हैं जो आज हमारे बीच नहीं हैं। सभी की तरह, ह्रास का भी तो तल होगा। चाहे वह संगीत शास्‍त्रीय हो या सुगम,संगीत सुनने की समझ तो होनी चाहिये। और उपलब्धता के स्तर पर सदैव बनी रहेगी।

हाँ, यदि श्रेष्ठ संगीत मिलना ही बंद हो जाए तो आम आदमी का व्यक्तित्व भी गिरावट पाएगा। इसमें सुधार तभी हो सकेगा जब देश में संगीत के अच्‍छे वातावरण का निर्माण किया जाये। दृश्‍य और श्रव्‍य संगीत के अन्‍तर को समझ दृश्‍य संगीत के प्रति ज्‍यादा जिम्‍मेदार और गंभीर होना पड़ेगा। तात्‍पर्य यह है कि जब तक संगीतज्ञ और श्रोता के बीच सही अथों में संवाद नहीं पैदा होगा तब तक वास्‍तविक सांगीतिक सौंदर्य की अनुभूति संभव नहीं। दोनों ही पक्षों को एक दूसरे के प्रति इमानदार होना पड़ेगा जिसके लिये प्रयास अभी से शुरू हो जाना चाहिये।

Advertisements

One response to “स्‍वरसंवाद-और-मानवीय-गुण

  1. Bahut hi saral shabdon me yatharth likha hai.Vartman samay ke anukul yah lekh hai.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s