संगीत का महात्‍म्‍य:एक चिंतन

ccastयाज्ञवल्‍क्‍य स्‍मृति में लिखा है:-

” वीणा वादन तत्‍वज्ञ: श्रुति जाति विशारद: ।

तालज्ञश्‍चाप्रयासेन मोक्ष मार्गम् च गच्‍छति।।”

अर्थात् जो वीणा वादन के तत्‍व को जान लेता है और जो श्रुति जाति तथा ताल में विशारद हो चुका है वह बिना प्रयास के ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्‍त करता है।

उपरोक्‍त कथन भले ही आज से हज़ारों वर्ष पहले लिखा गया हो पर आज भी इस बात को अनुभव करने वाले इस कथन की सत्‍यता पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाना कदापि पसंद नहीं करते हैं। उक्त कथन  भावना से प्रेरित नहीं है बल्कि इस बात को सिद्ध करने के लिये वैज्ञानिक और गणितीय तर्क उपलब्‍ध हैं। उच्‍चतम ध्‍वनियों के मिश्रण से बने नाद के हज़ारों बिंदुओं में कुछ नाद बिंदू ऐसे हैं जो संगीत के स्‍वर के रूप में चुने गये हैं इन्‍हीं नाद बिंदुओं को संसार ‘स्‍वर’ के  नाम से जानता है। ये स्‍वर ‘स्‍वत: रंजक’ होते हैं अर्थात् ऐसे नाद बिन्‍दु जिनमें गूंज पैदा हो जाती है और जो अपनी तारता(pitch) नहीं बदलते ‘स्‍वर’ के रूप में पहचाने जाते हैं। इन्‍हीं स्‍वरों के माध्‍यम से संगीत कला का निर्माण हुआ है।

संगीत कला के निर्माण की प्रक्रिया तब तक पूर्ण नहीं हो सकती है जब तक कि उसमें ‘ताल’ की क्रिया न जुड़ी हो। ताल का अर्थ गति से है। अर्थात् संगीत कला के दो प्रमुख तत्‍व स्‍वर तथा लय जो नाद और गति के ही परिष्‍कृत रूप हैं के बिना संगीत का कलात्‍मक स्‍वरूप विकसित नहीं हो सकता है।

उपरोक्‍त कथन के बखान से तात्‍पर्य यह है कि जिस संगीत के महात्‍म्‍य पर इतना कुछ लिखा गया हो वास्‍तव में आज की स्थिति में यह सब असंगत जान पड़ता है। मैं जिस बात को यहॉं इंगित करना चाहती हूँ और जिससे मेरा हृदय आहत है वह उपरोक्‍त कथन की सच्‍चाई पर कुठारागात करने वाला है। स्‍वरों का साम्राज्‍य तो सुरीलेपन का साम्राज्‍य है जहॉं बेसुरेपन की कोई जगह नहीं होनी चाहिये।। चाहें संगीतज्ञ गायक हो अथवा वादक, यदि दोनों में से कोई एक भी बेसुरा है तो संगीत कला जो आनंदामृत देने वाली है अमृत पान कराने की बजाये विष पान कराने वाली कला हो उठेगी और जो कि संगीत के रसिक के प्रति न केवल अन्‍याय होगा बल्कि अत्‍याचार भी कहलायेगा। भारतीय संगीत में यह बात तो और भी लागू होती है क्‍योंकि भारतीय संगीत पद्धति का निर्माण ही स्‍वरों के संवाद तत्‍व पर किया गया है। भारतीय दर्शन में षडज -पंचम और षडज – मध्‍यम को आत्‍मा और परमात्‍मा के सदृश्‍य माना है। यदि आत्‍मा पंचम है तो परमात्‍मा षडज है। जिस प्रकार परमात्‍मा का संबंध आत्‍मा से है वैसे ही षडज का संबंध पंचम और मध्‍यम  से है जो अविछिन्‍न और शाश्‍वत है। जैसे एक परमात्‍मा से समस्‍त सृष्टि का निर्माण हुआ है वैसे ही षडज के गर्भ से समस्‍त स्‍वरों का प्रादुर्भाव हुआ है। जिस प्रकार आत्‍मा कभी दूषित नहीं होती वैसे ही पंचम और मध्‍यम स्‍वर अपना अन्‍तराल नहीं बदलते अस्‍तु बेसुरे नहीं हो सकते हैं।

भारतीय परंपरा में  इस नियम को जीवंत करने के लिये ही ‘राग’ का निर्माण हुआ। भारतीय संगीत के  इस महात्‍म्‍य को हर युग में दुनिया के हर कोने में सराहा गया। पर क्‍या कारण है कि आज हमारे भारत देश में संगीत कला के क्षेत्र में इतना बेसुरापन आ गया। क्‍यों युगों युगों से इस देश की हवा में जो सांगीतिक शुद्धता थी आज लड़खड़ाती प्रतीत हो रही है। कारण स्‍पष्‍ट है- संगीत के माध्‍यम से तथाकथित अधकचरे अनुभवहीन लोगों में यश और ऐश्‍वर्य प्राप्‍त करने की चाह। अब यहॉं सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि येन केन प्रकारेण यदि यह सब इन्‍हें उपलब्‍ध भी हो गया हो  तो क्‍या सच्‍चाई बदल जायेगी। क्‍या एक लघुदृष्‍टा दीर्घदृष्‍टा कहलाने का हकदार हो जायेगा। क्‍या एक बेसुरा सुरीला कहलाया जाने लगेगा। मेरे विचार से नहीं। यदि कोई देश अथवा समाज इन बातों पर विचार करना नहीं चाहता तो इसमें नुकसान कहॉं और किसका  हो रहा है यह बताने की आवश्‍यकता नहीं। यदि हमने अपने सांगीतिक स्‍तर को सुधारने का प्रयास नहीं किया तो ऐसा भी तो हो सकता है कि एक समय ऐसा आये जब ये कान किसी सुरीले गीत को सुरीले कंठ से  सुनने के लिये भी तरस जायें। इस सुरीले देश में इतनी बड़ी संख्‍या में बेसुरे और बेतुके संगीत कलाकार कभी भी नहीं थे। जिन्‍होंने अच्‍छे संगीत का आनंद लिया है उनके हृदय की व्‍यथा क्‍या कोई समझ सकेगा। ऐसे में कवि बिहारी की वह पँक्तियॉं  याद आती हैं-

”तंत्री नाद, कवित्‍त रस, सरस राग रति रंग

अनबूड़े बूड़े, तिरे जे बूड़े सब अंग।”

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5 responses to “संगीत का महात्‍म्‍य:एक चिंतन

  1. रोचक और ज्ञानवर्धक !

  2. Dr. Santosh Pathak

    बहुत उपयोगी एवं ग्यान वर्धक है आज के इस समय मे ऐसे ही शोध की जरुरत है जिससे संगीत जगत को कुछ मिल सके इस कमप्युटर के युग मे यह शोध बहुत ही उप्योगी सिद्ध होगा. इस अनुपम कार्य के लिये बहुत बहुत धन्यवद‍

  3. mahesh Shandilya

    बहुत ही उपादेय संज्ञान.

  4. Dr.Mahesh Shandilya

    संगीत की तथ्यात्मक सुरूचिपूर्ण जानकारी.

  5. आधुनिक समय में संगीत की दशा व् स्तिथि पर महत्वपूर्ण चिंतन विषयक शोध है।अति ज्ञानवर्धक ।

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