भारतीय अज्ञानता का क्या कहना कि संगीत की भारतीय परम्परा को आज भी संदेह से ही देखा जा रहा है। हमारे आधुनिक समय के अधिकॉंश भारतीय वाद्यों को विदेशी वाद्यों का विकसित रूप बताकर हमारे ही कलाकार बड़े गर्व से अपने संगीत का बखान करते हैं। चाहे वह सितार हो या तबला, चाहें वह तानपुरा हो या सरोद या शहनाई। सभी कुछ तो अरब और यूनान से आया है। इस मामले में बिचारे उ. अमीर खुसरो बिना बात बलि का बकरा बने हुए हैं। उन्होंने तो अपने बखान में (निश्चय ही वो कम बड़बोले नहीं थे) कहीं भी यह घोषित नहीं किया है कि उन्होंने उपर्युक्त कोई भी वाद्य का निर्माण किया। पर उनके चाहने वालों ने इसका श्रेय भी उन्हें ही दे डाला। और तो और, देश के एक प्रतिष्ठित संस्थान द्वारा बनवायी गयी फिल्म तो शताब्दियों बाद उपजे खयाल गायन को भी उन्हीं की देन बताती है; पता नहीं मियाँ तानसेन ने खयाल क्यों नहीं सीखा! काश कि उन्हें भी टाईम-ट्रैवल आता तो अपने वंशज अदारंग और सदारंग से एकाध बंदिश तो सीख ही आते। वैसे भी कौन उ. अमीर खुसरो इससे इन्कार करने वापस आ रहे हैं। अब भाई अंगरेज़ बहादुर दनादन प्रश्न पर प्रश्न पूछ रहे हैं तो जवाब तो कुछ देना ही पड़ेगा न । तो यह वाद्य किसने बनाया, फलॉं वाद्य के निर्माता कौन हैं इत्यादि के जवाब में निद्रा से जगे गायक वादकों ने तुरंत अपने पुर्खों के नाम गिना दिये कि ‘साहेब इन्ही ने तो बनाया है और माफ कीजिये हुज़ूर और ज्यादा मत पूछिये हमारी साधना में खलल पड़ता है।’ बस इस बात को बड़े ही साधारण तरीके से कैप्टन विलर्ड ने अपने संस्मरण में लिखा कि कुछ लोग कहते हैं कि सितार के आविष्कारक अमीर खुसरो थे। इतने से तिल को ताड़ बनाने वाले ये हम भारतीय ही हैं।
हर प्रकार के प्रमाण के साथ आज डॉ. लाल मणि मिश्र जी ने अपनी पुस्तक ‘ भारतीय संगीत वाद्य’ में यह साबित कर दिया है कि सितार आदि वाद्य विदेशी नही बल्कि प्राचीन भारतीय वाद्यों के ही विकसित रूप हैं। सितार प्राचीन त्रितंत्री वीणा; सरोद, सुरश्रृंगार व रबाब प्राचीन चित्रा वीणा और सारंगी इत्यादि वाद्य प्राचीन रावणहस्त के ही विकसित रूप हैं। जिन्हें इन वाद्यों के बारे में प्रामाणिक जानकारी चाहिये उन्हें प्रामाणिक पुस्तकों को ही देखना चाहिये।
सबसे बड़ा दुर्भाग्य जो हमारे देशवासियों के साथ है वह यह कि वे हर विषय को बहुत हल्के रूप में लेते हैं। संगीत कला तो और भी ज्यादा इस हल्केपन का शिकार हुई है क्योंकि इसका सीधा संबंध मनोरंजन से भी है। जहॉं मनोरंजन की बात आयी वहॉं पूरे विश्व की मानसिकता एक ही दिशा में जाती हुई दिखाई देती है। आज पूरा भारत (विशेष रूप से वो अधिकारी जो कुछ करने लायक जगह पर बैठे हैं) संगीत के नाम पर सिर्फ फिल्म संगीत सुनना पसंद करते हैं और आज के बच्चे म्यूजिक वीडियो देखना! फिल्म संगीत साठ के दशक तक फिर भी थोड़ा ठीक था जहॉं समय समय पर भारतीय वाद्यों का प्रयोग बड़ी सुन्दरता से किया जाता था (कम से कम इसी बहाने कुछ भारतीय वाद्यों की आवाजें जनता जनार्दन के कानों में तो पड़ जाती थी)।
पर जैसे जैसे भारत का युवा आज़ाद होता गया उसने भारतीय आत्मा को तो बेडि़यॉं पहना दी और अपने भौतिक और नश्वर शरीर को गिरवी रख दिया पाश्चात्य संस्कारों के बैंक में। अब एक नया भारत आपके सामने खड़ा है जो कार्पोरेट दुनिया का सबसे बड़ा दानव साबित हो रहा है। जहॉं भारतीयता नहीं वहॉं भारतीय आत्मा कहॉं मिलेगी। जिस प्रकार भारतीय वाद्य बिना सुर में ढाले नहीं बजाये जा सकते वैसे ही भारतीय आत्मा बिना संस्कारित हुए प्रज्ज्वलित नहीं हो सकती है। वैसे भी चाहे कितना ही विदेशी परिवेश में भारतीय जी ले, उनकी चमक दमक अपना ले किंतु वह रहेगा भारतीय ही (संस्कारहीन ही सही)।
भारतीयता कोई धर्म नहीं है जिसे अपना लिया जाये। भारतीयता एक जीवन शैली है जो समय लेकर पनपायी जाती है। जिस प्रकार किसी वृक्ष को खड़े होने में जमीन, खाद, देखरेख की आवश्यकता होती है, वैसे ही भारतीय संस्कार डालने के लिये बच्चे को संस्कारित होने की आवश्यकता होती है। और ये संस्कार रूपी खाद सत्य, न्याय और पुरुषत्व से ही बन सकते हैं। ‘पुरुषत्व’ वास्तव में मानवीय गुण की पराकाष्ठा होती है जिसके प्रयोग से राजा भी ‘विक्रमादित्य’ कहलाता है।
आज यदि हम नजर घुमाकर देखें तो पायेंगे कि भारतीय संगीत एक बहुत बड़ा भौतिक माध्यम है अपनी हालत को समझने का। भारतीय संगीत भारतीय संस्कारों का दर्पण है। जब भी भारतीय पढ़ा लिखा युवा अच्छे संगीत को समझने और सुनने लायक अपने को कर लेगा वैसे ही भारतीयता स्वत: ही उसके अंदर वास करने पहुँच जायेगी। क्योंकि भारतीय स्वरों के अंदर बसने वाले मानवीय संस्कारों में जो अलौकिकता है उसका कोई जोड़ नहीं है।
भौतिक शास्त्र भी आज ऐसे साम्राज्य को स्वीकार रहा जो उसके शास्त्रीय नियमों से परे है। किंतु इस क्वाण्टम जगत की विचित्रता अपनी स्थिति में सत्य, ग्राह्य होने पर भी इस लोक के भौतिक नियमों को परिवर्तित नहीं कर पाती। ऐसे ही मूल गणितीय आधार पर मुनि भरत ने भारतीय स्वरों की स्थापना की थी। इन्हें नज़रअंदाज़ कर आधारहीन ध्वनि-समूह से संगीत सृजन की कल्पना हमारी उसी जन्मजात स्थूल मन:स्थिति को अभिव्यक्त करती है जिसे सुसंस्कृत और परिष्कृत करने की चेष्टा, भारतीय संस्कृती गढ़ डालती है।