भारतीय वीणाओं में श्रेष्ठ ‘विचित्रवीणा’

भारतीय वाद्यों के विकास की परंपरा अति प्राचीन रही है। यद्यपि इनका विकास क्रम वैदिक परंपरा से चला आ रहा है तथापि समय के साथ इनके रूप  में परिवर्तन भी होता रहा है। मुख्‍य रूप से इनका परिवर्तन अपने स्‍वरूप, बनावट और  वादन सामग्री में दिखाई देता है। इन वाद्यों का विकास निरंतर होता गया और ये प्राचीन वाद्य समाज के बदलाव व विकास के  साथ अपने परिष्‍कृत व परिमार्जित रूप लेकर समाजिक उन्‍नयन के समानान्‍तर चलते हुए हमारे सामने आते गये। आज भारतीय  वाद्यों के जो भी प्रकार (प्रचलित या अप्रचलित) प्रचार में  हैं वे सभी हमारी भारतीय परंपरा और उसके सुन्‍दर इतिहास के साक्षी हैं।

अधुना प्रचलित व अप्रचलित शास्‍त्रीय वाद्यों में सितार, सरोद, सारंगी, सुरबहार, रुद्रवीणा, विचित्रवीणा, जलतरंग, शंतूर, बॉंसुरी, शहनाई, तम्‍बूरा, तबला, पखावज, दुक्‍कड़, कर्नाटकीय वीणा, बट्टाबीन, मृदंगम् इत्‍यादि वाद्य हैं। इन्‍हीं वाद्यों में एक वाद्य है –  ’विचित्रवीणा‘ जिसके महात्‍म्‍य और विराटता की चर्चा यहॉं की जा रही है। आज जिसे हम ‘विचित्रवीणा’ कह कर पुकारते हैं उसे प्राचीनकाल में ब्राम्‍ही वीणा, घोषवती,घोषिका या एकतंत्री वीणा कहा जाता था। समय के साथ इस प्राचीन वाद्य का प्रचार घटता गया और मध्‍य काल में तो यह करीब करीब लुप्‍त प्राय: हो गयी। सम्‍भवत: इसका प्रमुख कारण वाद्यों में सारिका का प्रयोग (9वीं शताब्‍दी में सर्वप्रथम किन्‍नरी वीणा में सारिका का प्रयोग किया गया) प्रारंभ होना तथा षडज और मध्‍यम ग्राम के साथ ही मूर्छना पद्धति का  तिरोहित होना (11वीं-12वीं शती) और षडज स्‍वर का स्थिर हो जाना है जिसके फलस्‍वरूप चिकारी इत्‍यादि की व्‍यवस्‍था का आविष्‍कार हुआ और किन्‍नरी, त्रितंत्री और चित्रा वीणा के नये रूप सामने आाये। मध्‍य काल में किन्‍नरी ने ही रुद्र वीणा का रूप लिया। त्रितंत्री वीणा का विकास दो रूपों में हुआ,  एक तो निबद्ध तंबूरा के रूप में और दूसरा अनिबद्ध तम्‍बूरा के रूप में। निबद्ध तंबूरा ही आगे चलकर सितार के रूप में विकसित हुआ और अनिबद्ध तंबूरा तानपुरे के रूप में प्रचलित हुआ। चित्रावीणा का स्‍वरूप विकसित हो कर सरोद और रबाब के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। ये सभी वाद्य किसी एक व्‍यक्ति के आविष्‍कार का परिणाम नहीं हैं बल्कि इन वाद्यों के निर्माण और विकास में युगों की सृजनशीलता और कलात्‍मकता का योगदान रहा है जो आज भी अपने आप में एक आश्‍चर्य का विषय है। विचित्रवीणा का विकास मध्‍यकाल में बाधित ही रहा किन्‍तु  इस अतुलनीय वाद्य का पुन: प्रचार लगभग 18वीं 19वीं शताब्‍दी में फिर हुआ जो अपने मौलिक रूप से न केवल भिन्‍न दिखाई दी वरन् सभी वाद्यों से बड़ी और क्लिष्‍ट भी बनी।

विचित्रवीणा का स्‍वरूप बहुत कुछ रुद्रवीणा के समान है। किन्‍तु बारीकी से देखने पर यह उससे काफी भिन्‍न है। प्रमुख बात ये है  कि इसमें परदों का प्रयोग नही किया जाता है जिसके कारण इसका वादन क्लिष्‍टतम हो जाता है। लगभग 50 इंच लम्‍बा, 5इंच चौड़ा एवं ढाई इंच गहरी डाड इस वीणा के बृहद स्‍वरूप को दिखाती है। तुन्‍न या टीक से बने दण्‍ड में बॉंयीं और दाहिनी ओर छ: बड़ी खूँटियॉं होती है जिससे मुख्‍य तार बँधे होते हैं।इसके अतिरिक्‍त चार से पॉंच खूँटियॉं चिकारी की लगती हैं। दाहिनी ओर  दो  और बॉंयीं ओर तीन  खूँटियॉं मुख्‍य दण्‍ड में  लगायी जाती हैं। इस प्रकार10 से 11 बड़ी खूँटियॉं इस वाद्य में प्रयुक्‍त होती हैं।इसके अलावा 11 से 15 तक तरब की खूँटिया भी  होती हैं जिनसे तरब  के तार बॉंधे जाते हैं। इस बृहद वीणा को दो बड़े तुम्‍बों के सहारे सीधा रखा जाता है। जिसकी उँचाई जमीन से करीब 15 इंच पर होती है। इस वाद्य के अग्र भाग में मोर अथवा किसी पक्षी का मुखड़ा एक लकड़ी में नक्‍काशी कर के अलग से लगा दिया जाता है। पिछले भाग का हिस्‍सा लगभग 12 इंच का टुकड़ा होता है मुख्‍य तार की खूँटियॉं इसी टुकड़े के दोनो ओर लगती हैं। इस वाद्य को कॉंच के बने बट्टे से बजाया जाता है।

इस वाद्य का वादन मुख्‍य रूप से दो तारों में किया जाता है। पहला तार जो 8 नम्‍बर का इस्‍पात का तार होता है इसे षडज स्‍वर में मिलाया जाता है। इस तार में मध्‍य सप्‍तक से तार सप्‍तक तक का विस्‍तार होता है। इसके बाद दूसरा तार 9 नम्‍बर के इस्‍पात का होता है जिसे मंद्र स्‍वर के पंचम में मिलाते हैं। इसके बाद के दो तार पीतल के 20 नम्‍बर व 18 नम्‍बर के होते हैं जो क्रमश: मंद्र षडज और अति मंद्र पंचम में मिलाये जाते हैं। इसके अतिरिक्‍त दो तार 7-7 नम्‍बर के बाज के तार के पहले और अति मंद्र पंचम के बाद लगाये जाते हैं जिन्‍हें ‘छेड़ के तार’ कहा जाता है। चिकारी के तार आगे भी होते हैं और पीछे भी।

वादन करने के लिये करीब 23 इंच का स्‍थान घुड़च और तार गहन के बीच का होता है। इस पूरे हिस्‍से में कॉच का बट्टा बॉयें हाथ से रगड़ते हुए स्‍वरों को ध्‍वनित किया जाता है। दा‍हिने हाथ में तर्जनी और मध्‍यमा उँगली में मिजराब धारण कर तारों को छेड़ा जाता है। वादक को दाहिने और बॉंये हाथ का सामंजस्‍य बनाये रखने के लिये अभ्‍यास करना पड़ता है जो एक अत्‍यंत कठिन प्रक्रिया है।

इस वाद्य की वादन विधि अत्‍यंत कठिन व श्रमसाध्‍य होने के कारण इसका वादन बहुत कम कलाकार कर पाते हैं। बीसवीं सदी में ‍जिन प्रमुख वीणावादकों का नाम लिया जाता है उनमें उस्‍ताद अब्‍दुल अज़ीज़ खॉं,  संगीतेंदु डॉ. लाल मणि मिश्र, श्री गोपाल कृष्‍ण, श्री रमेश प्रेम, डॉ. गोपालशंकर इत्‍यादि हैं। 21 वीं सदी में कुछ महिलाओं ने भी इस वाद्य को अपनाने में पहल की है जो एक शुभ लक्षण है।

विचित्र वीणा सम्‍भवत: भारतीय वाद्यों में श्रेष्‍ठ इसलिये भी कहलाती है क्‍योंकि जब तक रागदारी, स्‍वरों का समुचित ज्ञान, संवाद तत्‍व और लय- ताल पर अधिकार प्राप्‍त नहीं हो जाता इस वाद्य को बजा पाना सम्‍भव नहीं है। जो कलाकार इन तत्‍वों का ज्ञान प्राप्‍त किये बिना ही बजाने की चेष्‍टा करते हैं वे या तो खुद हास्‍य का पात्र बन जाते हैं या कुछ समय के बाद इसे दु:साध्‍य कहकर छोड़ देते हैं। इस वाद्य में ओजस्विता पैदा कर सकने का गुण मुश्किल से ही आ पाता है। यद्यपि उपर्युक्‍त बात सभी भारतीय वाद्यों में लागू होती है तथापि अन्‍य तंत्री वाद्यों में सामान्‍यत: स्‍वरों का स्‍थान सारिका अथवा पर्दों के द्वारा निर्धारित कर दिया जाता है जिसके फलस्‍वरूप वे इतने दुर्बोध नहीं लगते। ये तर्क दिया जा सकता है कि   जिन तंत्री वाद्यों में पर्दा व्‍यवस्‍था नहीं होती जैसे सरोद सारंगी इत्‍यादि वहॉं भी स्‍वरों के स्‍थान का अंदाज़ अवश्‍य लगाना पड़ता है किन्‍तु, इन वाद्यों की लम्‍बाई चौड़ाई आमतौर पर उतनी बृहद नहीं होती जितनी विचित्र वीणा की है, अस्‍तु, चाहें तान क्रिया हो या मुर्की, गमक इत्‍यादि स्‍वरों को स्‍पर्श करने की प्रक्रिया, उनके बजाने के लिये वाद्य वादन का दायरा उतना ही बड़ा बनाना पड़ता है जितना बड़ा उस वाद्य को बजाने का क्षेत्र होता है।

वीणावादन में जो सामग्री बजायी जाती है वह गत और गायकी दोनों के मेल से ही बनती है इसके साथ ही यह  हर कलाकार की अपनी समझ और क्षमता पर निर्भर करती है। डॉ. लाल मणि मिश्र जी ने इस वाद्य में तकनीकी और प्रायोगिक विस्‍तार की अनन्‍त संभावनाओं को जन्‍म दिया जिसके फलस्‍वरूप इसके वादन के  क्षेत्र का आश्‍चर्यजनक विस्‍तार सम्‍भव हो पाया। उन्‍होंने इस वाद्य को जिस प्रकार साधा था उसको देख कर यह कहा जा सकता है कि ऐसा वादन कहीं भी देखा सुना नहीं गया। उनकी वादन शैली में कोई भी राग अपनी सृजनशीलता के उच्‍चतम स्‍तर पर पहुँच अपना विस्‍तार कर सकता था। उनके द्वारा बजाये गये रागों में सिंदूरा, कौशीकान्‍हणा, बसंतबहार तिलंग आनन्‍द भैरव,मुल्‍तानी और आनन्‍द भैरवी रागों के एल.पी., सीडी और वीडियो अमरीका से निकाले गये किन्‍तु दुर्भाग्‍य से उनका भारत में आगमन नहीं हो सका। इसके अलावा उनके द्वारा बजाये गये 90 से भी ज्‍यादा रागों का संग्रह स्‍पूल टेप में मौजूद है जो आज भी सुविज्ञ श्रोताओं तक नहीं पहुँच पाया है। जिन्‍होंने उनके वादन को सुना है वे इस संबंध में मेरी बात से पूर्ण सहमत होंगे। भारत में बड़ी बड़ी संस्‍थाओं ने भी कभी ये नहीं सोचा कि देश में आज न जाने कितने पुराने कलाकारों की रिकार्डिंग्स जगह जगह बिखरी पड़ी हैं जिनका एक सम्‍पूर्ण डेटा बना कर उन सभी रिकार्डिंग्स को जनता के सामने लाया जाये। इसके लिये जो प्रोजेक्‍ट बनाये जाते हैं वे अनुभवहीनता के कारण या तो अनुपयोगी साबित  होते हैं या बीच में ही कालकवलित हो जाते हैं।

ये दुख की बात है कि जो काम संगीत संस्‍थाओं की जिम्‍मेदारी थी वे उसे भी न निभा सके , शिक्षण संस्‍थाऍं महज परीक्षा करवाने और डिगरी बॉंटने के गढ बन गये और संगीत रिसर्च अकादमी नियमों के पेंच में अपने समूचे आदर्शों को भुला बैठी। सवाल ये उठता है कि जब ये सारी संस्‍थाऍं जो सामग्री उनके पास संग्रहित है उसे ही नहीं सम्‍भाल पा रही हैं तो जो अप्रचलित वाद्य और गायन- वादन शैलियॉं आज बिना किसी प्रश्रय के आज तक किसी प्रकार जिवित बच गयी हैं उनके संरक्षण के लिये वे क्‍या उपाय कर पायेंगे?

विचित्र वीणा न केवल प्राचीन बल्कि दुर्लभ वाद्यों में से है बल्कि आज इस वाद्य को सीखने व सिखाने वाले भी नगण्‍य हैं। जो वाद्य आज हजारों वर्षों की यात्रा करता हुआ यहॉं तक पहुँचा है क्‍या इस वाद्य और इसके समान दूसरे दुर्लभ वाद्यों के प्रति हमारी कोई जिम्‍मेदारी नहीं? अपने देश के इन दुर्लभ वाद्यों को बजाने की प्रेरणा और प्रचार कैसे हो ऐसे उपाय करे जाने चाहिये। आज प्रचार प्रसार के जमाने में जहॉं हर प्रकार की शिक्षा मार्केट में बिकती हैं  वहॉं भारतीय संगीत वाद्यों के प्रशिक्षण के प्रचार प्रसार में संकोच कैसा? आज हमारी इसी अज्ञानता और अनभिज्ञता के कारण जहॉं पावन गंगा तक के लुप्‍त हो जाने की आशंका जताई जा रही हो वहॉं उन भारतीय संस्‍कृति के न जाने कितनी अमूल्‍य धरोहरों को हम हर दिन खोते जा रहे हैं इसका अंदाज़ा कौन लगायेगा?

कृपा वर्षा

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर रचित गीताँजलि के एक पद का मुक्त अनुवाद श्रीमती कृष्णा शुक्ला द्वारा

तब आओ मुझ पर कृपा वर्षा से।
जब आकर्षण लोप हो गया हो जीवन
तब स्फूर्त गीत से मुझ पर छा जाओ।

अंधोत्तेजित चर्या- कोलाहल जब
चँहु ओर फैल ढँक ले मुझे दूर
मेरे निकट आओ अखण्ड स्थिर मौन के स्‍वामी,
स्निग्ध शान्ति से भर जाओ।

बन्द एक कोने में जब
सकुचाया हताश मेरा याचक हृदय
अनुनय में
झुका बैठा हो,

तोड़, खोल दो दरवाज़े को
मेरे राजन! और आओ
विजयी नरेश के गौरव गुण गाते परिजन अनुचर संग।

अंधा कर दे मन को जब
तीव्र कामना माया रज से –
ओ पवित्र जाग्रत आओ तुम
अपने प्रकाश और वज्र युक्त उस क्षण।

‘एकरूपता की वैयक्तिकता’

भारत में शास्त्रीय संगीत के उच्‍चस्तरीय प्रशिक्षण के लिये उपयुक्‍त केन्‍द्रों की कमी आज भी अनुभव की जाती है। यह कोई नया अभाव नहीं है। बुद्धि के साथ, प्रतिभा होने पर ही संगीत सीखा जा सकता है। हाँ, संगीत-शास्त्र का एक भाग केवल बुद्धि-परक माना जा सकता है। किंतु केवल इस बुद्धि-परक अंश को ही भारतीय संगीत शिक्षण नहीं माना जा सकता। आज इस वैश्विक सन्निकटता युग में हमारा शिक्षण-दर्शन भी परिवर्तन चाहता है। समय की गति प्रभावित करने वाली इक्कीसवीं शताब्दी में इच्छा और भोग की दूरी घट गयी है। सोच और अनुसँधान में समय गँवाने के अपेक्षा त्वरित अनुकरण श्रेयस्कर प्रतीत होता है। इसलिये उद्योग, बाज़ार, प्रशासन, मीडिया आदि की तर्ज़ पर भारतीय शिक्षण में भी बदलाव लाये जाने चाहिये—ऐसा मानना उचित प्रतीत होने लगा। यह उत्तर-आधुनिक (अब तो इसे उत्तर-आधुनिकता-पश्चात तक कहा जाने लगा है) काल की विडम्बना है कि कारण-कार्य की अनिवार्यता समाप्त हो चुकी है। पदार्थ के सत्य में विचार की सम्भावना अब मान्य नहीं है। परिवर्तन देवोभव: के मंत्रपालन में मूलाधार को होम कर रहे हैं इस से चिंतित होने की दृष्टि लुप्त हो चुकी है। और इसी चिंता/विचारमुक्तता के साथ भारतीय संगीत शिक्षण भी परिवर्तन के गेहूँ में घुन की तरह पिसने को बाध्य है।DSCN0217

पाश्चात्य संगीत का शिक्षण भी प्रमुखतया व्यवहार आधारित है। तकनीकी क्षेत्र में आयी समृद्धि का उपयोग वहाँ दोनों पक्षों — बुद्धि और व्यवहार — के शिक्षण में किया गया। प्राथमिक से लेकर उच्चतम स्तर तक संगीत के व्यावहारिक पक्ष हेतु आवश्यक अधो-सँरचना संगीत शिक्षण की प्राथमिकता मानी जाती है और अन्य समस्त शिक्षण सम्बंधी नियम इस के बाद आते हैं। पश्चिम में आधुनिक परिवर्तनों ने शिक्षा की सरसता को प्रभावित किया है, किंतु समरसता को अभी भी अनिवार्य उपांग माना है। कला-शिक्षण के शास्त्रीय पक्ष में आधुनिक तत्वों के मिश्रण ने उसके घनत्व को कम भले ही किया हो, किंतु विचार के केंद्र-बिंदु से अपदस्थ नहीं किया। ज्ञान की नयी धाराओं में प्राचीन और समय-सिद्ध आज भी सम्यक और प्रासंगिक है भले ही नव-श्रिन्खलाओं के जाल में सद्य:-दृष्ट न रहे।

पश्चिम की तुलना में भारतीय संगीत के विद्यार्थियों के हित में जो कार्य होना चाहिये था वह नहीं हो पाया है। आज भारतीय संगीत को सीखने की ललक न केवल भारतीयों को है बल्कि पूरे विश्‍व से लोग इसे सीखने व समझने को उत्‍सुक दिखायी देते हैं। यह भारतीय संगीत का दुर्भाग्‍य ही है कि जिन उच्‍च आादर्शों के साथ भारत में संस्‍थागत संगीत शिक्षण का प्रारंभ हुआ उसका सही मायने में व्‍यवहार नहीं हो पाया। इन संस्‍थाओं द्वारा ही 70 के दशक तक बहुत अच्‍छे कार्य किये गये किन्‍तु उसके बाद धीरे धीरे स्थिति बद से बदतर होती गयी। आचार्य भातखण्डे, पलुस्कर शिक्षण की जो शैली निर्मित कर रहे थे उसका एक पक्ष तो विश्व-विद्यालयीन व्यवस्था में विकसित होने लगा। व्यावहारिक पक्ष भी एक हद तक सुरक्षित रहा। किंतु पारम्परिक गुरु-शिष्य शिक्षण पद्धति को नये स्वरूप में जीवंत रखने हेतु तत्कालीन शिक्षाविदों द्वारा सुझाए जा रहे संगीतालय (कंज़र्वेटरी) नहीं विकसित किये गये। और तो और स्कूल स्तर पर भी संगीत को विषय (पाठ्यक्रम) से हटा अभिरुचि (पाठ्येतर गतिविधि) बना दिया गया। परिणाम स्वरूप विश्व-विद्यालयीन स्तर पर होने वाला विकास अवरुद्ध हो गया।

आचरण और मान्यता सत्य को बदल नहीं सकते; केवल उसे भ्रमपूर्ण आवरण उढ़ा सकते हैं। इसलिये, हम कोई भी पद्धति अपनाएँ उसकी एक निश्चित दिशा होगी। परिणाम को ध्यान में रख कर ही योजनाएँ बनायी जाती हैं। विकसित देश भारत और चीन के मेहनती और समझदार विद्यार्थियों का उदाहरण अपने युवा को देते हैं। जिस पीढी की कार्यशैली पर वो मुग्ध होते हैं उस पीढ़ी के विद्यार्थी पुरानी, ठोस वार्षिक शिक्षा पद्धति से ही शिक्षित हुए थे। उस पद्धति का गुण वार्षिक होना नहीं वरन अंतर्निष्ठ होना था। इसका पालन कहीं अच्छा और कहीं बेपरवाही से हुआ। समुचित सँसाधन के अभाव में श्रेष्ठ योजना भी रुग्ण हो जाएगी। लगातार बदलते लघु-कालिक दृष्टिकोण और दिशाहीन परिवर्तनों से सभी स्तरों पर शिक्षा में गिरावट होती रही। वर्षों तक राष्ट्रीय प्राथमिकता पर गौण रहने के कारण शिक्षा-स्तर गिरता रहा। प्रयास विस्तार के थे, उन्नयन के नहीं। साक्षरता बढ़ी, पर इसके अतिरिक्त कुशलता नहीं। भारत का समझदार, मेहनती युवा आगे बढ़ पाया तो व्यक्तिगत प्रयासों से और अपने अध्यापकों के उत्साह-वर्धन से। उनका समय तो निर्धारित संख्या से तिगुने, अठगुने विद्यार्थियों को देखने, सम्भालने में व्यतीत होता था। मेधावी छात्र को कक्षा के बाहर ही पढ़ा सकते थे। यह उस पुरानी प्रणाली का कमाल था कि ऐसे बुद्धिमान विद्यार्थियों को शिक्षकों के संकेतात्मक शिक्षण को स्वाध्याय से मज़बूत करने का पूरा समय मिल जाता था।

बिना यह तय किये कि हमारे किन उद्देश्यों को सेमेस्टर प्रणाली पूरा कर सकती है, आज पूरे देश में सभी स्तरों पर लागू किये जाने के प्रयास चल रहे हैं। हास्यास्पद है कि जो प्रणाली भिन्न पाठ्यक्रमों का समान मूल्यांकन करने के लिये विकसित हुई, उसी को लागू करते हुए यहाँ विश्व-विद्यालयीन स्तर पर भी समान पाठ्यक्रम (यूनीफाइड सिलेबस) रखा जा रहा है। प्रदेश भर के विश्वविद्यालयों में एक ही पाठ्यक्रम रखा गया है। तर्क है कि विद्यार्थी किसी भी महाविद्यालय से किसी भी स्तर पर, प्रदेश भर में कहीं अन्यत्र जा, वही पाठ्यक्रम पढ़ सकता है। इस सुविधा के पीछे महाविद्यालयों तक को दी जाने वाली, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता समाप्त हो गयी, इस तथ्य से कोई चिंतित नहीं है। एक ओर तो योजना है कि प्रत्येक विद्यार्थी की रुचि, रुझान, प्रगति का सतत मूल्यांकन किया जाए, वहीं पूरे राज्य/देश में एक साथ एक ही विषय पढाये जाएँ। एकरूपता की वैयक्तिकता का सिद्धांत एक दशाब्दी में एक शताब्दी पिछड़ने का सिद्ध मंत्र है। और पूर्व का दोष — सँसाधनों की कमी — अभी भी बरकरार है। इस कमी को पूरा करने का उपाय शिक्षा को लाभकारी गतिविधि मान लेना है। जिन्हें इसका लाभ चाहिये वो इसका मूल्य चुकायेंगे। इस दर्शन को आधिकारिक रूप से स्वीकारने के पहले ही शिक्षा का व्यापारीकरण आरम्भ हो चुका है। अब तक तो राजाओं, धनाढ़्यों की संतानों के लिये चलाये जा रहे संस्थानों में ही धन और शिक्षा का कोई सूत्र बन पाता था। सामान्य स्थिति के पालक से भी शिक्षा के नाम पर धन बटोरा जा सकता है। Delhi Aug 07 084वैश्विक जगत ने यदि समान रूप से सभी को कुछ बाँटा तो समान स्वप्न का अधिकार! मेधा के बल पर शीर्ष संस्थान में पढ़ने लायक नहीं हो तो क्या हुआ, अच्छी जगह कोचिंग लो, प्रवेश मिल जाएगा! पहले आई. ए. एस., फिर नौकरी हेतु अन्य परीक्षाएँ, आई.आई.टी., मेडिकल, मैनेजमेन्ट और अब तो किसी भी जगह होने वाली कैसी भी परीक्षा के लिये कोचिंग उपलब्ध है। मिट्टी और कोयले से बने मँजन को दवा मानने का भ्रम भोले भाले हमेशा से किये आ रहे हैं। अब तो हाल यह है कि ठग को कोई मेहनत ही नहीं है। उसकी खाली पुड़िया को ही खरीदने को लोग उतारू हैं। पर्याप्त बार ठगे जाने पर और कुछ आये न आये, ठगने की कला तो आ ही जाती है। ध्येय और लालसा में यही अँतर है। ज्ञानी कबीर कहता है,

कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोय।
आप ठगे सुख उपजे, और ठगे दुख होय ॥

अब तक शिक्षण का ध्येय हुआ करता था शाश्वत मूल्यों से व्यक्ति को परिष्कृत करना। नायक वह युधिष्ठिर होता था जिसे दुनिया में स्वयं से बुरा कोई नहीं दिखता था, वह मेहनती लकड़हारा होता था जो अपनी लोहे की कुल्हाड़ी के आगे सोने, चाँदी की कुल्हाड़ी अस्वीकार कर देता था, खेत को बाढ़ से बचाने के लिये टूटी मेड़ पर लेट जाने वाला बालक या फिर ईदगाह से दादी के लिये चिमटा खरीदने वाला हमीद जो खुशबू से मिठाई के स्वाद की कल्पना से खुद को उबार लेता है, भारतीय युवा मन को दिशा देते थे।  आज बचपन से ही ‘जीनियस क्लास’, ‘स्पेशल लर्निंग’, उन्हें स्कूल के एकाधिकार से मुक्त करता है। सुबह कुछ सीखता है, शाम को कुछ और। आखिर हाथी के ही क्यों दो दाँत—खाने के और, दिखाने के और?

संस्थागत शिक्षा के विरुद्ध पनपा कोचिंग व्यापार अब मान्य गतिविधि है। कुछ राज्य उनकी आय को कराधीन कर उन्हें शिक्षण सँस्थान के रूप में मान्य कर रहे हैं। शिक्षा के अब तक के प्रतिमानों से अलग ऐसी वाणिज्यिक, लाभ-प्रेरित, स्वार्थकेंद्रित, अस्वस्थ क्रिया भी यदि ज्ञान-वर्धक मानी जा सकती है तो क्यों नहीं मुख्य-धारा शिक्षण को मुक्त कर देते जिससे कम से कम कहीं तो निस्वार्थ योगी ज्ञान को लुप्त होने से बचा सकें? मुख्य-धारा शिक्षण के लिये यह चुनौतीपूर्ण समय है जब ऐसे मानक-गुणों से उन्हें बाँधा जा रहा है जो देश के मूल्यों के ठीक विपरीत हैं। शिक्षा के अधिकार के समतुल्य शिक्षण-अधिकार भी होना चाहिये।

भारत जैसे विशाल देश के लिये शिक्षा के क्षेत्र में अनेक लक्ष्य हैं जिन्हें अलग रख कर ही प्राप्त किया जा सकता है। अब तक इन सब के लिये विशिष्ट योजनाएँ बनायी जाती रही हैं। किंतु बाज़ार बनते विश्व में अपनी साख बचाने/बनाने के लिये जो तीव्र-गति उपाय किये जा रहे हैं वो सतही शिक्षा को कुछ समय के लिये (या शायद हमेशा के लिये) आकर्षक रूप दे दें, न तो ज्ञान का कोई विकास कर पाएँगे और न ही अपनी प्राचीन निधि को समेट पाएँगे।

भारतीय संगीत पूरी तरह भारतीय है जिसके सीखने और सिखाने के तरीके भारतीय हैं। इनका सीधा संबंध योग, शांति और सृजन से है, जिसको सीखने में 10 से 12 वर्षों का समय लगता है। क्षीण होने के बाद भी आज तक प्राचीन काल से जुड़ी हुई संगीत-कला का शिक्षण केवल इन्हीं मान्यताओं के बीच हो सकता है जो द्वापर, त्रेता, कलियुग को एक साथ माला में बुन लेती है। जो कला सीधे भारतीय संस्‍कारों से जुड़ी हुई है, जिसको सीखने की इच्‍छा रखने वाले पूरे विश्‍व से लोग आते हैं, जिसके प्रयोग से मन की शान्ति प्राप्‍त होती है और जो शास्‍त्र के प्रशिक्षण का अकेला स्रोत है ऐसी कला को सहेजने के लिये विशिष्ट संस्‍थान बनाना तो दूर उसे किसी प्रकार जिलाये रखने वाले संगीत संस्‍थानों (महाविद्यालय और विश्‍वविद्यालय) पर सेमेस्‍टर प्रणाली थोप कर इस सहज प्राप्य धरोहर को नष्ट करना इतिहास और भविष्य के साथ अन्याय है। मनोरँजन हेतु चिह्नित ध्वनि समूह जिसे विश्व संगीत मानता है, भारतीय संगीत को परिभाषित नहीं करता। न ही व्यक्तिगत लाभ के लिये किया गया उसका प्रदर्शन भारतीय संगीत है। अनंत को, चिरंतन को जानने पर होने वाले आनंद को मूर्त कर देने की क्षमता रखने की जीवन कला ही भारतीय संगीत है। भोग, लिप्सा और त्वरित क्षणभँगुर सुख से प्रेरित प्रणाली इसका शिक्षण कर सकती है, यह बुलबुले को गेंद मानने वाली शिशु-कल्पना के लिये ही सँभव है।

भारतीय संगीत और भारतीय संस्कार

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तरकश के तीर

भारतीय अज्ञानता का क्‍या कहना कि संगीत की भारतीय परम्‍परा को आज भी संदेह से ही देखा जा रहा है। हमारे आधुनिक समय के अधिकॉंश भारतीय वाद्यों को विदेशी वाद्यों का विकसित रूप बताकर हमारे ही कलाकार बड़े गर्व से अपने संगीत का बखान करते हैं। चाहे वह सितार हो या तबला, चाहें वह तानपुरा हो या सरोद या शहनाई। सभी कुछ तो अरब और यूनान से आया है। इस मामले में बिचारे उ. अमीर खुसरो बिना बात बलि का बकरा बने हुए हैं। उन्‍होंने तो अपने बखान में (निश्‍चय ही वो कम बड़बोले नहीं थे) कहीं भी यह घोषित नहीं किया है कि उन्‍होंने उपर्युक्‍त कोई भी वाद्य का निर्माण किया। पर उनके चाहने वालों ने इसका श्रेय भी उन्‍हें ही दे डाला। और तो और, देश के एक प्रतिष्ठित संस्थान द्वारा बनवायी गयी फिल्म तो शताब्दियों बाद उपजे खयाल गायन को भी उन्हीं की देन बताती है; पता नहीं मियाँ तानसेन ने खयाल क्यों नहीं सीखा!  काश कि उन्हें भी टाईम-ट्रैवल आता तो अपने वंशज अदारंग और सदारंग से एकाध बंदिश तो सीख ही आते।  वैसे भी कौन उ. अमीर खुसरो इससे इन्‍कार करने वापस आ रहे हैं। अब भाई अंगरेज़ बहादुर दनादन प्रश्‍न पर प्रश्‍न पूछ रहे हैं तो जवाब तो कुछ देना ही पड़ेगा न ।  तो  यह वाद्य किसने बनाया, फलॉं वाद्य के निर्माता कौन हैं इत्‍यादि  के जवाब में निद्रा से जगे गायक वादकों ने तुरंत अपने पुर्खों के नाम गिना दिये कि ‘साहेब इन्‍ही ने तो बनाया है और माफ कीजिये हुज़ूर  और ज्‍यादा मत पूछिये हमारी साधना में खलल पड़ता है।’ बस इस बात को बड़े ही साधारण तरीके से कैप्‍टन विलर्ड ने अपने संस्‍मरण में लिखा कि कुछ लोग कहते हैं कि सितार के आविष्‍कारक अमीर खुसरो थे। इतने से तिल को ताड़ बनाने वाले ये हम भारतीय ही हैं।

हर प्रकार के प्रमाण के साथ आज डॉ. लाल मणि मिश्र जी ने अपनी पुस्‍तक ‘ भारतीय संगीत वाद्य’  में यह साबित कर दिया है कि सितार आदि वाद्य विदेशी नही बल्कि प्राचीन भारतीय वाद्यों के ही विकसित रूप हैं। सितार प्राचीन त्रितंत्री वीणा; सरोद, सुरश्रृंगार व रबाब प्राचीन चित्रा वीणा और सारंगी इत्‍यादि वाद्य प्राचीन रावणहस्त के ही विकसित रूप हैं। जिन्‍हें इन वाद्यों के बारे में प्रामाणिक जानकारी चाहिये उन्‍हें प्रामाणिक पुस्‍तकों को ही देखना चाहिये।

सबसे बड़ा दुर्भाग्‍य जो हमारे देशवासियों के साथ है वह यह कि वे हर विषय को बहुत हल्‍के रूप में लेते हैं। संगीत कला तो और भी ज्‍यादा इस हल्‍केपन का शिकार हुई है क्‍योंकि इसका सीधा संबंध मनोरंजन से भी है।  जहॉं मनोरंजन की बात आयी वहॉं पूरे विश्‍व की मानसिकता एक ही दिशा में जाती हुई दिखाई देती है। आज पूरा भारत (विशेष रूप से वो अधिकारी जो कुछ करने लायक जगह पर बैठे हैं) संगीत के नाम पर सिर्फ फिल्‍म संगीत सुनना पसंद करते हैं और आज के बच्‍चे म्‍यूजिक वीडियो देखना! फिल्‍म संगीत साठ के दशक तक फिर भी थोड़ा ठीक था जहॉं समय समय पर भारतीय वाद्यों का प्रयोग बड़ी सुन्‍दरता से किया जाता था (कम से कम इसी बहाने कुछ भारतीय वाद्यों की आवाजें जनता जनार्दन के कानों में तो पड़ जाती थी)।

पर जैसे जैसे भारत का युवा आज़ाद होता गया उसने भारतीय आत्‍मा को तो बेडि़यॉं पहना दी  और अपने भौतिक और नश्‍वर शरीर को गिरवी रख दिया पाश्‍चात्‍य संस्‍कारों के बैंक में। अब एक नया भारत आपके सामने खड़ा है जो कार्पोरेट दुनिया का सबसे बड़ा दानव साबित हो रहा है। जहॉं भारतीयता नहीं वहॉं भारतीय आत्‍मा कहॉं मिलेगी। जिस प्रकार भारतीय वाद्य बिना सुर में ढाले नहीं बजाये जा सकते वैसे ही भारतीय आत्‍मा बिना संस्‍कारित हुए प्रज्‍ज्‍वलित नहीं हो सकती है। वैसे भी चाहे कितना ही विदेशी परिवेश में भारतीय जी ले, उनकी चमक दमक अपना ले किंतु वह रहेगा भारतीय ही (संस्‍कारहीन ही सही)।

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ठहरा संगीत

भारतीयता कोई धर्म नहीं है जिसे अपना लिया जाये। भारतीयता एक जीवन शैली है जो समय लेकर पनपायी जाती है। जिस प्रकार किसी वृक्ष को खड़े होने में जमीन, खाद, देखरेख की आवश्‍यकता होती है, वैसे ही भारतीय संस्‍कार डालने के लिये बच्‍चे को संस्‍कारित होने की आवश्‍यकता होती है। और ये संस्‍कार रूपी खाद सत्‍य, न्‍याय और पुरुषत्‍व से ही बन सकते हैं। ‘पुरुषत्‍व’ वास्‍तव में मानवीय गुण की पराकाष्‍ठा होती है जिसके प्रयोग से राजा भी ‘विक्रमादित्‍य’ कहलाता है।

आज यदि हम नजर घुमाकर देखें तो पायेंगे कि भारतीय संगीत एक बहुत बड़ा भौतिक माध्‍यम है अपनी हालत को समझने का। भारतीय संगीत भारतीय संस्‍कारों का दर्पण है। जब भी भारतीय पढ़ा लिखा युवा अच्‍छे संगीत को समझने और सुनने लायक अपने को कर लेगा वैसे ही भारतीयता स्‍वत: ही उसके अंदर वास करने पहुँच जायेगी। क्‍योंकि भारतीय स्‍वरों के अंदर बसने वाले मानवीय संस्‍कारों में जो अलौकिकता है उसका कोई जोड़ नहीं  है।

भौतिक शास्त्र भी आज ऐसे साम्राज्य को स्वीकार रहा जो उसके शास्त्रीय नियमों से परे है। किंतु इस क्वाण्टम जगत की विचित्रता अपनी स्थिति में सत्य, ग्राह्य होने पर भी इस लोक के भौतिक नियमों को परिवर्तित नहीं कर  पाती। ऐसे ही मूल गणितीय आधार पर मुनि भरत ने भारतीय स्वरों की स्थापना की थी। इन्हें नज़रअंदाज़ कर आधारहीन ध्वनि-समूह से संगीत सृजन की कल्पना हमारी उसी जन्मजात स्थूल मन:स्थिति को अभिव्यक्त करती है  जिसे सुसंस्कृत और परिष्कृत करने की चेष्टा, भारतीय संस्कृती गढ़ डालती है।

वैचारिक संकीर्णता: भँवर-बिद्धता का संकट

भारतीय शास्‍त्रीय संगीत को हम तब तक नहीं समझ सकते जब तक हम उसे एक विषय या मनोरंजन का एक साधन समझते रहेंगे। यह बात सच है कि वस्‍तु की उपलब्‍धता उस वस्‍तु की महत्‍ता को कम कर देती है पर अयोग्‍य हाथों में पहुँचने पर तो उस वस्‍तु का नाश ही हो जाता है। भारतीय शास्‍त्रीय संगीत एक प्रकार का संगीत नहीं बल्कि एक दर्शन है, एक चिंतन है, एक सोच है, परमानंद को प्राप्‍त करने का एक साधन है, परमेश्‍वर के दर्शन का एक स्रोत है।

भारतीय संगीत की शास्‍त्रीयता स्‍वरों में क्लिष्‍टता पैदा नहीं करती वरन् स्‍वरों को धूमकेतु के समान प्रकाशित कर, उन्‍हें एकसार कर, उन स्‍वर बिंदुओं में प्राण फूँक देती है जिसके फलस्‍वरूप स्‍वर मानवीय गुणों को प्राप्‍त कर सम्‍पूर्णता को प्राप्‍त होते है। संगीत में स्थित सौंदर्य की अनुभूति मस्तिष्‍क की परिपक्‍वता पर निर्भर करती है। उसके श्रवण हेतु स्‍वरों के प्रयोग की नियमावली का जानना  आवश्‍यक नहीं होता। भारतीय संगीत के अन्‍दर स्‍वरों के लगाव को इसीलिये इतना महत्‍वपूर्ण माना है। भारतीय रागों का व्‍यक्तित्‍व इतने स्‍वाभाविक तरीके से विकसित हुआ है कि उसके अन्‍दर के माधुर्य को अपने आप प्रस्‍फुटित होने का अवसर मिल जाता है। यह संवाद तत्‍व ही भारतीय संगीत की आत्‍मा है जहॉं एक अकेला कलाकार हज़ारों लोगों की आत्‍मा के अ्रतरंग पहलुओं को भी झंकृत कर देने की क्षमता रखता है।

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पिटारी में ज्ञान

अधुना भारतीय मस्तिष्‍क प्रदूषित हो जाने के कारण नाद के अन्‍दर छिपी शक्ति और उसके सौंदर्य को समझ पाने में पूर्ण अक्षम हो चुका है। जिस प्रकार के अव्‍यवहारिक नियमों में फँसा कर भारतीय शिक्षण पद्धति का सत्‍यानाश आज किया जा रहा है वो अपने आप में भँवर-बिद्ध  बुद्धि का सबसे बड़ा उदाहरण है। भारतीय कला साहित्‍य तथा दर्शन पढ़ने के लिये जहॉं एक उम्र भी छोटी समझी जाती है वहॉं हमारे देश के नौनिहाल तीन महीने तूफानी पठन कर येनकेन प्रकारेण परीक्षा की जंग में शहीद होने को चाकचौबंद हो जाते हैं। परिणाम भी किसी हारे हुए युद्ध वीर की तरह ही होता है यानि या तो फेल या एटीकेटी। इस युद्ध के सेनापति और राजा के पास इस बात की कोई चिंता या समझ नहीं कि उनके बनाये इस युद्ध योजना में उनके कितने सिपाही (विद्यार्थी) शहीद हुए और कितने घायल।  वो बेचारे नासमझ सैनिक ऑंख मूँदकर बिना युद्ध योजना समझे खुद को बलि का बकरा बना गला कटवाने को तैयार हो जाते हैं। सवाल यह है कि क्‍या ये कल के भारत निर्माता आज अज्ञानतावश अपने आप को बलि का  बकरा बनने देते रहेंगे या इन्‍हें कभी कोई ज्ञान भी प्राप्‍त होगा?

संगीत कला और साहित्‍य की त्रिवेणी में जिसने गोता लगा लिया वह तो वैतरणी पार कर गया समझो। पर फिर वही सवाल कि कल तक नौनिहाल रहे ये युवा, आज अपने आपको दूसरे के निर्णयों पर कब तक चलाते रहेंगे? क्‍या शिक्षा का अर्थ ज्ञान प्राप्‍त करना नहीं है? ज्ञान के रास्‍ते में मनोरंजन का कोई स्‍थान नहीं है। शिक्षा को मनोरंजन के साथ जोड़ना उसके साथ‍ खिलवाड़ करने जैसा है। एक ओर तो शिक्षा के नाम पर दैत्याकार कामनाएँ — आई.आई.टी., आई.आई.एम. – पसरी हैं, दूसरी ओर ‘लर्न बाय फ़न’ जैसा शिगूफा मारी मॉन्टेसरी की सच्ची लगन का मज़ाक उड़ाता नज़र आता है। सॉफ्ट-वेयरबेस्ड डिजिटल बोर्ड पर होने वाली  पढ़ाई में शिक्षक नहीं लर्निंग-फेसिलिटेटर की ज़रूरत है।  अपने बच्चों से स्वस्थ बचपन छीन कर हम उनसे चमत्कारिक परिणाम की उम्मीद रखते हैं। आजकी पीढ़ी संतान नहीं कमाऊ पूत पालती प्रतीत होती है।

शिक्षण अत्‍यंत गंभीर प्रक्रिया है जिसके साथ बहुत बड़ी जिम्‍मेदारियॉं जुड़ी हुईं हैं। भारत में आज हर विषय को एक खिलवाड़ की तरह समझा जाता है। ऐसा मात्र इस लिये है कि नालायक को भी वही ज्ञान चाहिये जो लायक को। कितनी समदर्शी है उत्तर-आधुनिकता! शताब्दियों तक जो गुण कहलाते थे, सामंतशाही के काल में भी जिन्हें ख़त्म  न किया जा सका, उन्हें सामंतशाही करार कर आज ‘फ़्लैट वर्ल्ड’ के पटरे पर ला खड़ा किया है।   अब लायकों की संख्‍या तो बढ़ी नहीं, हॉं नालायक दर्रे दर्रे में अपनी दुकानें लगा कर बैठ गये। जैसे वो बगल में रसगुल्‍ला और रेवड़ी बिक रही है वैसे ही यहॉं ज्ञान बिक रहा है — आओ, ले लो ज्ञान बस दो ढाई लाख में। ये वाला ज्ञान  पचास हजार का… और ये वाला तो भारतीय है… ये मात्र बीस हजार का समझो। जहॉं आजकल इम्‍पोर्टेड ज्ञानी आ गये हैं और भारतीय कला साहित्‍य और संगीत को एक्‍सपोर्ट क्‍वालिटी का बनाने में जद्दोजहद कर रहे हैं, तो जैसे कॉमन वेल्‍थ में भारत का नाम बदनाम हुआ है, वैसे ही अज्ञानता से पुष्ट  एक सम्पूर्ण  पीढ़ी भविष्य में पूरे विश्व को गुरु कहे  जाने वाले देश की आधुनिक संताने मूल्य-विहीन, संस्कार-च्युत, लोलुप, अज्ञानी  के रूप में जानी जाएँगी।

चिन्ता है कि धन से भी ज्‍यादा कीमती मानव मस्तिष्‍क के क्षरण का यह देश क्‍या मूल्‍य चुकायेगा?

काव्‍य-चेतन

श्रम हीन, बोध हीन, सृजन हीन श्राप्‍य युग

सत्‍व, तत्‍व, साध्‍य से विमुक्‍त राग त्‍यक्‍त युग

 

दानहीन, कर्णहीन, पुण्‍यहीन, तेजहीन

श्रुति, राग, हार, तान, सर्व कोमला विहीन

हत, छिन्‍न, भिन्‍न क्षुब्‍ध, रुग्‍ण, व्‍याधि-श्लथ युग

 

नादब्रम्‍ह, स्‍वरब्रम्‍ह, ज्ञान पुंज प्रकाश से

विभेद-भेद बोध हो -  ईष्‍ट अभीष्‍ट हो ये युग

स्‍वरसंवाद-और-मानवीय-गुण

भारतीय संगीत वास्‍तव में मानवीय गुण और चरित्र का निष्पाप दर्पण है। जब बात होती है स्‍वर संवाद की, श्रुतियों की, स्‍वरों के लगाव की तो प्रकृति के स्‍वाभाविक स्‍वरूप में सृजन और सौंदर्य के निर्माण का शुद्धतम स्‍वरूप प्रस्‍फुटित हो उठता है। ये बात जग जाहिर सी है कि आज भारत के अंदर आम व्‍यक्ति अपनी शुद्धता खो बैठा है। दूर किसी और देश में बैठे सद्चरित्र, तेजवान और श्रमसाध्‍य मनुष्‍यों को आज अपना ही देश बेगाना लगने लगा है।

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वातायन के पार

इस बात का अहसास मात्र सांगीतिक अवचेतना के बढ़ते दायरे से ही लगाया जा सकता है कि भारतीय मानसिकता पर बेसुरे स्‍वर कितने हावी हो चुके हैं। आज अधिकांश स्‍वरों की दुनिया में गूँजते स्‍वर अपना अस्तित्‍व ही खो चुके हैं। स्‍वरों के अंदर जिस संवाद तत्‍व को भारतीय आत्‍मा -परमात्‍मा का योग मानते आये है वो संवाद तत्‍व शुद्धता के बिना प्राप्‍त नहीं किया जा सकता है। ये शुद्धता आचरण, योग, साधना और चिन्‍तन द्वारा ही प्राप्‍त होती है। प्राचीन काल से ही भारत में संगीत प्रदर्शक और संगीत साधक ये दो प्रकार के संगीतज्ञ रहे हैं। इन दोनों में अन्‍तर मात्र सांगीतिक आचरण का है। जहॉं एक संगीत को व्‍यवसाय मान कर चलता है तो दूसरा संगीत को परमात्‍मा का स्‍वरूप जान उसको आत्‍मसात कर ईश्‍वरार्पण कर देता है। इन दोनों प्रकार के साधकों का ज्ञान अपने क्षेत्र में पूर्ण रहा है। किन्‍तु पिछले दो दशकों में इन दोनों ही प्रकार के साधकों ने अपने तथाकथित संगीत के द्वारा सुधि श्रोता को निराश ही किया है। निराशा से भी ज्‍यादा ये कहना अधिक उचित है कि वे स्वयं को छला सा पाते हैं। उम्मीद कुछ कर के जाते हैंऔर सुनाई देता है कुछ और। रसज्ञ श्रोता जाते हैं सुंदर संगीत सुनने। सुरुचिपूर्ण मँच, सभागार इस आनंद कामना को उद्दीप्त करते हैं। आकर्षक वस्त्र, मुद्राओं से सज्जित कलाकार भी इस सम्भावना को दृढ़ करते हैं। किंतु जब ध्वनि के स्तर पर लचर किंतु दृश्यव्यता से परिपूर्ण, प्रस्तुति को सुनते हैं तो अपनी ही कामना पर संदेह के प्रश्न-चिह्न लगा बैठते हैं।

आज यदि आधुनिक संसाधनों के द्वारा अमूल्‍य संरक्षित संगीत का खजाना उपलब्‍ध न होता तो विश्‍व भर में फैले संगीत रसिकों का हाल बेहाल हो जाता। एक शोध पत्र में इस बात का उल्‍लेख हुआ है कि आज जीवित व्‍यक्तियों के द्वारा गाये गये संगीत से ज्‍यादा लोग उन संगीतज्ञों के रिकार्डेड संगीत को ज्‍यादा सुन रहे हैं जो आज हमारे बीच नहीं हैं। सभी की तरह, ह्रास का भी तो तल होगा। चाहे वह संगीत शास्‍त्रीय हो या सुगम,संगीत सुनने की समझ तो होनी चाहिये। और उपलब्धता के स्तर पर सदैव बनी रहेगी।

हाँ, यदि श्रेष्ठ संगीत मिलना ही बंद हो जाए तो आम आदमी का व्यक्तित्व भी गिरावट पाएगा। इसमें सुधार तभी हो सकेगा जब देश में संगीत के अच्‍छे वातावरण का निर्माण किया जाये। दृश्‍य और श्रव्‍य संगीत के अन्‍तर को समझ दृश्‍य संगीत के प्रति ज्‍यादा जिम्‍मेदार और गंभीर होना पड़ेगा। तात्‍पर्य यह है कि जब तक संगीतज्ञ और श्रोता के बीच सही अथों में संवाद नहीं पैदा होगा तब तक वास्‍तविक सांगीतिक सौंदर्य की अनुभूति संभव नहीं। दोनों ही पक्षों को एक दूसरे के प्रति इमानदार होना पड़ेगा जिसके लिये प्रयास अभी से शुरू हो जाना चाहिये।

स्वरलिपि: लिखित संगीत?

संस्थागत संगीत शिक्षण प्रणाली के उद्भव के साथ वास्तव में भारतीय संगीत की परंपरा में पहली बार व्यावहारिक संगीत को लेखबद्ध करने का प्रयास प्रारंभ हुआ। फलस्वरूप, संगीत के व्यावहारिक पक्ष को मज़बूती प्रदान करने के निमित्तो विभिन्न रागों की बंदिशों और राग के सम्पूर्ण स्वर- विस्तार को लिपिबद्ध करने के उपाय ढूंढे जाने लगे। आधुनिक काल में संगीत के क्रियात्मक पक्ष को लिखने के लिये उसके प्रयोगात्मक चिन्हों के निर्माण पर विचार विमर्श शुरू हुआ। इस कार्य को मूर्तरूप प्रदान करने में आधुनिक काल की दो महान संगीत हस्तियों (पं विष्णु दिगम्बर पलुस्कार तथा पं विष्णु नारायण भातखण्डे) का योगदान अद्वितीय रहा है। इन दोनों विद्वानों ने संगीत के क्रिया पक्ष को लेखबद्ध करने का गुरूतर कार्य प्रारंभ किया। फलस्वरूप, भारत में प्रथम बार इतने बृहद् स्तर पर राग की बंदिशों का लेखन प्रारंभ हुआ। पं विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने अपनी छ: भागों में लिखी गई पुस्तक ‘ हिन्दुस्तानी संगीत- पद्धति क्रमिक पुस्तक मालिका’ में स्वनिर्मित स्वरलिपि द्वारा सैकड़ों बंदिशों को लिपिबद्ध कर उसका संग्रह किया। पं विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी ने भी पुस्तक ‘भारतीय स्वर लेखन पद्धति’ व ‘ संगीत तत्व दर्शक भाग 1-2 ‘ जिसमें उन्होंने विस्तारपूर्वक स्वनिर्मित स्वरलिपि लेखन की विशद चर्चा की है तथा अन्य अनेक दूसरी व्यावहारिक संगीत की पुस्तकों का लेखन कार्य (1926- 1931) व प्रकाशन किया जो दुर्भाग्यवश आज हमें प्राप्त नहीं है। फिर भी, उनके द्वारा प्रचारित की गई स्वरलिपि आज हमें उपलब्ध है। इसके पश्चात् पं विनायकराव पटवर्धन तथा पं शंकरराव जी व्या्स ने पं विष्णु दिगंबर की मूल लिपि में थोड़े बहुत परिवर्तन कर ‘राग विज्ञान’ तथा ‘व्यास कृति’ नामक पुस्ताकें छपवाई। बाद में पं ओंकार नाथ ठाकुर ने भी स्वरलिपि में थोडे. बहुत परिवर्तन कर अपनी पुस्तक ‘संगीतांजलि’ का प्रकाशन छ: भागों में किया। पं भातखण्डे जी द्वारा प्रचार पायी हुई स्वरलिपि पद्धति को ज्यादातर लोगों ने अपनाया। अधुना, अधिकांश पुस्तकों का निर्माण पं भातखण्डे स्वरलिपि पद्धति द्वारा ही किया जा रहा है। पं भातखण्डे तथा पं विष्णु दिगंबर पलुस्कर स्वरलिपि पद्धतियों के निर्माण में सहारा पाश्चात्य संगीत के’ स्टा‍फ नोटेशन’ का ही लिया गया है। अस्तु स्वरलिपि के निर्माण में बहुत सी ऐसी कमियॉं रह गयीं हैं जो पूरी तरह से भारतीय संगीत की लेखनपद्धति से जुड़ी हुई हैं।

विसम्वादी राग

शास्त्रोक्त गायन्

यद्यपि बहुत से लोग यह मानते हैं कि संगीत केवल प्रयोग का विषय है और मात्र अनुभव और रियाज़ से परिपक्वता पाता है तथापि उसके शास्त्रीय पक्ष को नकारना चंचल मनोवृत्ति का परिचायक है। निराधार प्रयोग ऐसी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न करता है जिसमें एक प्रतिष्ठित टेलिविज़न कार्यक्रम संगीत मनीषियों को आमंत्रित कर उन्हें अलग अलग रागों में गायन करने को प्रेरित करता है। पंचम प्रधान कलावती और मध्यम प्रधान आभोगी जैसी असम्बद्ध रागों को दो कलाकारों ने एक साथ प्रस्तुत किया।  कोमल और शुद्ध गान्धार अपने आप में विसम्वादी हैं; काबिल गायक होने के बाद भी ऐसी दशा में दोनों कलाकारों का बेसुरा सुनायी देना स्वाभाविक था। ऐसे प्रयोग समस्त शास्त्रों को ध्वस्त करने की उत्तर आधुनिक मनोवृत्ति से संचालित हैं किंतु अपर्याप्त सामयिक लेखन भी ऐसे कृत्यों को जन्म देता है।

प्रकाशन प्रक्रिया के कम्प्यूटर से किये जाने के फलस्वरूप पिछले दशक में बन्दिशों की अपेक्षा संगीत के अन्य पक्षों, यथा संगीतकारों के संस्मरण, जीवनी, सामाजिक उपयोगिता आदि पर अधिक पुस्तकें केन्द्रित रहीं हैं। भारतीय स्वरलिपि के अनुरूप कम्यूटर लिपि विकसित किये जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। साथ ही वर्तमान की देवनागरी लिपि आधारित लेखनपद्धति को भी चिह्न प्रधान बनाया जाना चाहिये। कुछ संगीतकार ऐसी ही एक स्वरलिपि का प्रयोग कर रहे हैं। उनके अनुभव भारतीय संगीत लेखन का मार्ग प्रशस्त करे, ऐसी कामना है।

संगीत का महात्‍म्‍य:एक चिंतन

याज्ञवल्‍क्‍य स्‍मृति में लिखा है:-

” वीणा वादन तत्‍वज्ञ: श्रुति जाति विशारद: ।

तालज्ञश्‍चाप्रयासेन मोक्ष मार्गम् च गच्‍छति।।”

अर्थात् जो वीणा वादन के तत्‍व को जान लेता है और जो श्रुति जाति तथा ताल में विशारद हो चुका है वह बिना प्रयास के ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्‍त करता है।

उपरोक्‍त कथन भले ही आज से हज़ारों वर्ष पहले लिखा गया हो पर आज भी इस बात को अनुभव करने वाले इस कथन की सत्‍यता पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाना कदापि पसंद नहीं करते हैं। ये बात भावना से प्रेरित नहीं है बल्कि इस बात को सिद्ध करने के लिये वैज्ञानिक और गणितीय तर्क उपलब्‍ध हैं। उच्‍चतम ध्‍वनियों के मिश्रण से बने नाद के हज़ारों बिंदुओं में कुछ नाद बिंदू ऐसे हैं जो संगीत के स्‍वर के रूप में चुने गये हैं इन्‍हीं नाद बिंदुओं को संसार ‘स्‍वर’ के  नाम से जानता है। ये स्‍वर ‘स्‍वत: रंजक’ होते हैं अर्थात् ऐसे नाद बिन्‍दु जिनमें गूंज पैदा हो जाती है और जो अपनी तारता(pitch) नहीं बदलते ‘स्‍वर’ के रूप में पहचाने जाते हैं। इन्‍हीं स्‍वरों के माध्‍यम से संगीत कला का निर्माण हुआ है।

संगीत कला के निर्माण की प्रक्रिया तब तक पूर्ण नहीं हो सकती है जब तक कि उसमें ‘ताल’ की क्रिया न जुड़ी हो। ताल का अर्थ गति से है। अर्थात् संगीत कला के दो प्रमुख तत्‍व स्‍वर तथा लय जो नाद और गति के ही परिष्‍कृत रूप हैं के बिना संगीत का कलात्‍मक स्‍वरूप विकसित नहीं हो सकता है।

उपरोक्‍त कथन के बखान से तात्‍पर्य यह है कि जिस संगीत के महात्‍म्‍य पर इतना कुछ लिखा गया हो वास्‍तव में आज की स्थिति में यह सब असंगत जान पड़ता है। मैं जिस बात को यहॉं इंगित करना चाहती हूँ और जिससे मेरा हृदय आहत है वह उपरोक्‍त कथन की सच्‍चाई पर कुठारागात करने वाला है। स्‍वरों का साम्राज्‍य तो सुरीलेपन का साम्राज्‍य है जहॉं बेसुरेपन की कोई जगह नहीं होनी चाहिये।। चाहें संगीतज्ञ गायक हो अथवा वादक, यदि दोनों में से कोई एक भी बेसुरा है तो संगीत कला जो आनंदामृत देने वाली है अमृत पान कराने की बजाये विष पान कराने वाली कला हो उठेगी और जो कि संगीत के रसिक के प्रति न केवल अन्‍याय होगा बल्कि अत्‍याचार भी कहलायेगा। भारतीय संगीत में यह बात तो और भी लागू होती है क्‍योंकि भारतीय संगीत पद्धति का निर्माण ही स्‍वरों के संवाद तत्‍व पर किया गया है। भारतीय दर्शन में षडज -पंचम और षडज – मध्‍यम को आत्‍मा और परमात्‍मा के सदृश्‍य माना है। यदि आत्‍मा पंचम है तो परमात्‍मा षडज है। जिस प्रकार परमात्‍मा का संबंध आत्‍मा से है वैसे ही षडज का संबंध पंचम और मध्‍यम  से है जो अविछिन्‍न और शाश्‍वत है। जैसे एक परमात्‍मा से समस्‍त सृष्टि का निर्माण हुआ है वैसे ही षडज के गर्भ से समस्‍त स्‍वरों का प्रादुर्भाव हुआ है। जिस प्रकार आत्‍मा कभी दूषित नहीं होती वैसे ही पंचम और मध्‍यम स्‍वर अपना अन्‍तराल नहीं बदलते अस्‍तु बेसुरे नहीं हो सकते हैं।

भारतीय परंपरा में  इस नियम को जीवंत करने के लिये ही ‘राग’ का निर्माण हुआ। भारतीय संगीत के  इस महात्‍म्‍य को हर युग में दुनिया के हर कोने में सराहा गया। पर क्‍या कारण है कि आज हमारे भारत देश में संगीत कला के क्षेत्र में इतना बेसुरापन आ गया। क्‍यों युगों युगों से इस देश की हवा में जो सांगीतिक शुद्धता थी आज लड़खड़ाती प्रतीत हो रही है। कारण स्‍पष्‍ट है- संगीत के माध्‍यम से तथाकथित अधकचरे अनुभवहीन लोगों में यश और ऐश्‍वर्य प्राप्‍त करने की चाह। अब यहॉं सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि येन केन प्रकारेण यदि यह सब इन्‍हें उपलब्‍ध भी हो गया हो  तो क्‍या सच्‍चाई बदल जायेगी। क्‍या एक लघुदृष्‍टा दीर्घदृष्‍टा कहलाने का हकदार हो जायेगा। क्‍या एक बेसुरा सुरीला कहलाया जाने लगेगा। मेरे विचार से नहीं। यदि कोई देश अथवा समाज इन बातों पर विचार करना नहीं चाहता तो इसमें नुकसान कहॉं और किसका  हो रहा है यह बताने की आवश्‍यकता नहीं। यदि हमने अपने सांगीतिक स्‍तर को सुधारने का प्रयास नहीं किया तो ऐसा भी तो हो सकता है कि एक समय ऐसा आये जब ये कान किसी सुरीले गीत को सुरीले कंठ से  सुनने के लिये भी तरस जायें। इस सुरीले देश में इतनी बड़ी संख्‍या में बेसुरे और बेतुके संगीत कलाकार कभी भी नहीं थे। जिन्‍होंने अच्‍छे संगीत का आनंद लिया है उनके हृदय की व्‍यथा क्‍या कोई समझ सकेगा। ऐसे में कवि बिहारी की वह पँक्तियॉं  याद आती हैं-

”तंत्री नाद, कवित्‍त रस, सरस राग रति रंग

अनबूड़े बूड़े, तिरे जे बूड़े सब अंग।”

अर्थ

स्‍वरों का संसार तो इस धरती पर वायु और अग्नि के साथ ही प्रगट हो गया था। पर उसकी सत्‍ता का ज्ञान प्राप्‍त करने में युगों का समय लगा। इसका आभास ही हृदय में एक अनूठी अनुभूति प्रदान कर देता है कि धरती की आत्‍मा को जागृत करने वाली इस अमूल्‍य धरोहर को ईश्‍वर ने कितना सुन्‍दर और मधुर बनाया है। स्‍वरों के प्रतिष्ठित होने की गाथा तो बहुत लम्‍बी है पर सप्‍तक के सात स्‍वरों को प्रगट करने में जिन प्रमुख चार स्‍वरों का हस्‍तक्षेप है  उनके अवतरण की कथा भी कम रोचक नहीं। इनके बिना तो सम्‍पूर्ण सप्‍तक का निर्माण संभव नहीं। ये चार स्‍वर हैं- षड्ज, गांधार, मध्‍यम और पंचम। षडज स्‍वर से पंचम, मध्‍यम और गांधार के बीच का अन्‍तराल स्‍वाभाविक और प्राकृतिक है यह सत्‍य सर्वविदित है। षडज स्‍वर अन्‍य स्‍वरों को उपजाने का कारक है अस्‍तु यह स्‍वर स्‍वत: सिद्ध है। किन्‍तु पंचम स्‍वर षडज से संवाद के आधार पर पैदा होता है। ठीक उसी प्रकार मध्‍यम स्‍वर तथा गांधार स्‍वर भी षडज के गर्भ से प्रस्‍फुटित होते हैं। जिस प्रकार षडज से पंचम के संवाद या अन्‍तराल को षडज-पंचम भाव तथा षडज से मध्‍यम के संवाद अथवा अन्‍तराल को षडज-मध्‍यम भाव कहते हैं उसी तरह षडज – गांधार का संवाद ‘षडजांतर’ भाव के नाम से प्रतिष्ठित हुआ है। यह ‘षडजांतर’ वास्‍तव में षडज और अंतर गांधार(आधुनिक शुद्धगांधार) के बीच का अन्‍तराल है जो स्‍वयंभु अर्थात् स्‍वत: अवतरित होने वाला है। अर्थात् यदि तानपुरे के स्‍वर पूरी तरह से सुर में मिला लिये जायें और उसे लगातार बजाते जायें तो एक अन्‍य स्‍वर अपने आप सुनाई पड़ेगा जो कि अन्‍तर गांधार स्‍वर ही है।

कहने का तात्‍पर्य यह है कि जिस प्रकार षडज के बजने से गांधार स्‍वर जो उसी के अन्‍दर प्रतिष्ठित है सुनने वाले को अलग ही से सुनाई पड़ जाता है ठीक वैसे ही मेरे मन के विचार प्रगट होकर सुविज्ञ जनों तक पहुँचे। जिस प्रकार षडज के अन्‍दर बसे गांधार के दर्शन ज्ञानी कर लेते हैं वैसे ही मेरे आत्‍मघटक से निकले विचारों  का सेवन जिज्ञासु करेंगे ऐसी मुझे आशा है। यही है मेरा ‘षडजांतर’